मानसून की सुस्ती: भारतीय कृषि पर प्रभाव

प्रारब्ध न्यूज़ ब्यूरो, लखनऊ 


​भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले मानसून ने इस साल किसानों को थोड़ा निराश किया है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, साल 2026 का जून महीना पिछले 146 वर्षों के इतिहास में सबसे सूखे महीनों में से एक दर्ज किया गया है। 15 जून के बाद से मानसून की रफ्तार अचानक सुस्त पड़ गई, जिसका सीधा असर देश के ग्रामीण इलाकों और खेती-किसानी पर दिखने लगा है।


मानसून की इस सुस्ती का हमारी कृषि और अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ रहा है।

​खरीफ फसलों की बुआई पर बड़ा असर

भारत में जून से सितंबर के बीच होने वाली मानसून की बारिश खरीफ फसलों के लिए जीवनदान होती है। देश की लगभग 50% कृषि भूमि सिंचाई के लिए सीधे तौर पर बारिश पर निर्भर है।


धान की रोपाई में देरी: चावल या धान भारत की मुख्य खरीफ फसल है, जिसे शुरुआती दौर में भारी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। जून में बारिश की 40% तक की कमी के कारण पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और बिहार के कई हिस्सों में धान की रोपाई (Transplantation) समय पर नहीं हो पाई है।


​तिलहन और दलहन प्रभावित: मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे राज्यों में सोयाबीन, मूंग, उड़द और मूंगफली जैसी फसलों की बुआई रुक गई है या उसमें देरी हो रही है। देरी से बुआई होने पर फसल की पैदावार (Yield) कम होने का खतरा बढ़ जाता है।

​जलाशयों का गिरता जलस्तर

​मानसून की सुस्ती का असर सिर्फ खेतों पर ही नहीं, बल्कि देश के प्रमुख बांधों और जलाशयों (Reservoirs) पर भी पड़ा है।


​केन्द्रीय जल आयोग (CWC) के आंकड़ों के अनुसार, देश के मुख्य जलाशयों में पानी का लाइव स्टोरेज उनके कुल क्षमता के बेहद निचले स्तर पर पहुंच गया है। अगर आने वाले दिनों में भारी बारिश नहीं होती है, तो आने वाले समय में नहरों द्वारा की जाने वाली सिंचाई और ग्रामीण इलाकों में पीने के पानी का संकट गहरा सकता है।

​अर्थव्यवस्था और महंगाई पर संभावित प्रभाव

जब-जब मानसून कमजोर होता है, उसका सीधा असर देश की जीडीपी (GDP) और आम आदमी की जेब पर पड़ता है:


खाद्य महंगाई (Food Inflation): दलहन और तिलहन की पैदावार कम होने से बाजार में दालों और खाने के तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं।


​ग्रामीण मांग में कमी: खेती से होने वाली आय कम होने पर ग्रामीण इलाकों में ट्रैक्टर, मोटरसाइकिल और रोजमर्रा के सामानों (FMCG) की बिक्री घट जाती है, जिससे पूरी इकॉनमी की रफ्तार धीमी हो जाती है।


​आगे की राह: क्या उम्मीद बाकी है?


​हालांकि जून का महीना सूखा बीता है, लेकिन मौसम विभाग (IMD) का अनुमान है कि जुलाई की शुरुआत से मानसून एक बार फिर रफ्तार पकड़ेगा। बंगाल की खाड़ी में बन रहे नए दबाव के क्षेत्रों के कारण जुलाई और अगस्त में अच्छी बारिश की उम्मीद जताई गई है।


​किसानों के लिए सलाह: कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि जिन इलाकों में बारिश में देरी हुई है, वहां किसानों को कम समय में तैयार होने वाली फसलों (Short-duration varieties) की बुआई करनी चाहिए और 'ड्रिप इरिगेशन' (टपक सिंचाई) जैसी तकनीकों का इस्तेमाल करना चाहिए।

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