The science behind the stalling: क्यों जून 2026 रहा सदी का सबसे सूखा महीना?


प्रारब्ध न्यूज़ ब्यूरो, लखनऊ 


इस साल मानसून की शुरुआत ने हर किसी के चेहरे पर खुशी ला दी थी। 4 जून 2026 को मानसून ने समय पर केरल में दस्तक दी और ऐसा लगा कि भीषण गर्मी से जूझ रहे भारत को जल्द ही राहत मिल जाएगी। लेकिन, जून का महीना खत्म होते-होते आंकड़े डराने वाले सामने आए हैं। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, जून 2026 पिछले 146 वर्षों (एक सदी से भी अधिक) में भारत का सबसे सूखा जून दर्ज होने की राह पर है।


​सेंट्रल इंडिया (मध्य भारत) में सामान्य से लगभग 60% कम बारिश हुई है। आखिर ऐसा क्या हुआ कि समय पर आया मानसून अचानक 'स्टॉल' (थम) गया? इसके पीछे की असली वजह कोई साधारण बदलाव नहीं, बल्कि 5 अलग-अलग मौसम प्रणालियों (weather systems) का एक दुर्लभ और अजीब कॉम्बिनेशन है। आइए आसान भाषा में इसके पीछे के विज्ञान को समझते हैं।


​1. समय पर एंट्री, फिर अचानक ब्रेक क्यों?


​मानसून की हवाएं समुद्र से नमी लेकर भारत के जमीनी हिस्सों की तरफ बढ़ती हैं। जून के शुरुआती हफ्ते में सब कुछ ठीक था, लेकिन जून के मध्य में आते-आते मानसून की रफ्तार पूरी तरह थम गई। मौसम विज्ञानियों (Meteorologists) के अनुसार, इस रुकावट की मुख्य वजह "एटमॉस्फेरिक ब्लॉकिंग" (Atmospheric Blocking) है।

आसान शब्दों में कहें तो हवा के ऊंचे दबाव वाले क्षेत्रों ने एक ऐसी दीवार खड़ी कर दी, जिसने नमी से भरे बादलों को आगे बढ़ने ही नहीं दिया।


​2. वो 5 वेदर सिस्टम जिन्होंने मानसून को 'किडनैप' कर लिया


​इस साल जून में एक साथ 5 अलग-अलग मौसम प्रणालियाँ एक ही लाइन में आ गईं। विज्ञान की भाषा में इसे "सिनॉप्टिक अलाइनमेंट" (Synoptic Alignment) कहते हैं। इन पांचों ने मिलकर मानसून के बादलों का रास्ता रोक दिया।


-एंटी-साइक्लोनिक सर्कुलेशन (Anti-Cyclonic Circulation)


अरब सागर के ऊपर हवा का एक हाई-प्रेशर ज़ोन बन गया। मानसून के लिए लो-प्रेशर (कम दबाव) की जरूरत होती है ताकि वो बादलों को खींच सके, लेकिन इस हाई-प्रेशर ने बादलों को भारत की जमीन की तरफ धकेलने के बजाय दूर कर दिया।


​कमजोर मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन (MJO)


 MJO बादलों का एक ऐसा चक्र है जो भूमध्य रेखा के पास घूमता है और मानसून को रफ्तार देता है। जून के महीने में यह पूरी तरह निष्क्रिय (Phase 1 में) रहा, जिससे मानसून को मिलने वाली 'ऊर्जा' खत्म हो गई।


पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) का दखल: उत्तर भारत में इस बार भूमध्य सागर से आने वाली सूखी और ठंडी हवाएं (Western Disturbances) लगातार सक्रिय रहीं। इन्होंने दक्षिण से आ रही नमी वाली हवाओं को रोक दिया।


​तिब्बत के पठार (Tibetan Plateau) का ठंडा रहना


मानसून को खींचने के लिए तिब्बत के पठार का गर्म होना बहुत जरूरी है, क्योंकि इसकी गर्मी से एक वैक्यूम (लो-प्रेशर) बनता है। इस बार वहां उम्मीद से ज्यादा बर्फबारी और कम तापमान के कारण यह हीटिंग इंजन चालू ही नहीं हो पाया।


​सब-ट्रॉपिकल जेट स्ट्रीम की स्थिति


 हवा की एक तेज रफ्तार पट्टी (Jet Stream) जो आमतौर पर जून में उत्तर की तरफ खिसक जाती है, वो इस बार भारत के ऊपर ही टिकी रही और उसने मानसून की हवाओं को ऊपर उठने से रोक दिया।


मानसून को आगे बढ़ने के लिए हवा में नमी और कम दबाव (Low Pressure) के एक 'सिंक' की जरूरत होती है। जब ये 5 सिस्टम एक साथ आए, तो उन्होंने इस सिंक को ही नष्ट कर दिया, जिससे बादल मध्य और उत्तर भारत तक पहुँच ही नहीं पाए।



​3. कृषि और आम जीवन पर इसका क्या असर होगा?

जून के इस सूखे ने भारतीय किसानों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। जून का महीना खरीफ फसलों (जैसे धान, मक्का, और सोयाबीन) की बुआई के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है।

बुआई में देरी


सेंट्रल और वेस्टर्न इंडिया में पानी की कमी के कारण बुआई का काम 2-3 हफ्ते पिछड़ गया है।


जल स्तर में गिरावट


भारत के प्रमुख जलाशयों (Reservoirs) में पानी का स्तर सामान्य से काफी नीचे चला गया है, जिससे आने वाले हफ्तों में बिजली उत्पादन और पीने के पानी की किल्लत बढ़ सकती है।



मौसम विभाग (IMD) का अनुमान है कि जून के आखिरी दिनों में यह 'ब्लॉकिंग' धीरे-धीरे कमजोर हो रही है। जुलाई के पहले हफ्ते से मानसून के दोबारा सक्रिय होने की पूरी संभावना है। लेकिन जून 2026 ने वैज्ञानिकों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्लाइमेट चेंज के इस दौर में मानसून को समझना कितना जटिल होता जा रहा है।
 

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