उत्तराखंड में होली का उल्लास शुरू! फाल्गुन पूर्णिमा 2 मार्च को होलिका दहन और 4 मार्च को धुलंडी। लखनऊ के उत्तराखंड महापरिषद भवन में 1 मार्च को मनेगा भव्य होलिकोत्सव। पढ़ें पूरी जानकारी।
उत्तराखंड की सांस्कृतिक होली 2026 : लखनऊ महापरिषद भवन में 1 मार्च को भव्य होलिकोत्सव
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| होली गीत गाते उत्तराखंड महापरिषद के पदाधिकारी। |
देवभूमि उत्तराखंड की संस्कृति में होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि राग-रागिनियों और परंपराओं का अनूठा संगम है। हिंदू चंद्र कैलेंडर (विक्रम संवत) के अनुसार, इस वर्ष फाल्गुन मास की पूर्णिमा यानी 2 मार्च 2026 की रात्रि को होलिका दहन किया जाएगा, जिसके पश्चात 4 मार्च को रंगों की होली (धुलंडी) हर्षोल्लास के साथ खेली जाएगी।
कुमाऊँ और गढ़वाल की होली: संगीत और संस्कृति का मेल
उत्तराखंड, विशेषकर कुमाऊँ क्षेत्र में होली का आगाज़ बसंत पंचमी से ही हो जाता है। यहाँ की होली अपनी विशिष्ट गायन शैलियों के लिए विश्व प्रसिद्ध है।
बैठकी होली : मंदिरों और घरों में हारमोनियम और तबले की थाप पर शास्त्रीय रागात्मक होली गाई जाती है।
खड़ी होली : गांवों के आंगन में पारंपरिक वेशभूषा पहनकर ढोल-दमाऊ के साथ घेरा बनाकर नृत्य और गायन होता है।
महिला होली : महिलाओं की टोलियाँ हास्य-व्यंग्य और सामाजिक सरोकारों से जुड़े लोकगीतों के माध्यम से खुशियां बांटती हैं।
उमड़ा 'पहाड़ी' उत्साह, महापरिषद भवन में आयोजन
उत्तराखंड की इस समृद्ध विरासत को सहेजने के लिए लखनऊ स्थित उत्तराखंड महापरिषद भवन में पारंपरिक होली गायन का शुभारंभ हो चुका है। ढोलक, मंजीरा और हारमोनियम की जुगलबंदी के बीच होलियारों की टोलियां देवभूमि की लोक संस्कृति को जीवंत कर रही हैं।
"यह उत्सव केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि हमारी भावी पीढ़ियों तक अपनी संस्कृति और लोकसंस्कारों को पहुँचाने का एक सशक्त माध्यम है।" - भरत सिंह बिष्ट, महासचिव, उत्तराखंड महापरिषद, लखनऊ
कार्यक्रम का विवरण, तारीख और समय
लखनऊ में रह रहे प्रवासी उत्तराखंडी समाज के लिए एक भव्य 'होलिकोत्सव' का आयोजन किया जा रहा है।
दिनांक : 1 मार्च 2026 (रविवार)
समय : दोपहर 3:00 बजे से
स्थान : उत्तराखंड महापरिषद भवन, लखनऊ
मुख्य आकर्षण : पारंपरिक वेशभूषा में होलियारों की टोलियां, बैठकी एवं खड़ी होली के मधुर गीत और सामूहिक भाईचारा।
विरासत को संजोने का संकल्प
महासचिव भरत सिंह बिष्ट ने सभी प्रवासियों से अपील की है कि वे अधिक से अधिक संख्या में इस पावन अवसर पर सहभागी बनें। आइए, हम सब मिलकर अपनी उत्तराखंडी विरासत को संजोएं और इस उत्सव को 'रंग, रस और संस्कृति' के महापर्व के रूप में मनाएं।

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