Delhi Tourism खूनी दरवाजा वो ऐतिहासिक दहलीज, जो आज भी देती है मुगल सल्तनत के अंत की गवाही

दिल्ली के खूनी दरवाजा का इतिहास रक्त रंजित रहा है। जानिए कैसे शेरशाह सूरी द्वारा निर्मित इस दरवाजे पर जनरल हॉडसन ने अंतिम मुगल शहजादों की हत्या कर मुगल सल्तनत का अंत किया।


प्रारब्ध न्यूज ब्यूरो, नई दिल्ली 

दिल्ली की व्यस्त सड़कों के बीच खड़ा खूनी दरवाजा (Khooni Darwaza) आज भले ही शांत दिखाई देता हो, लेकिन इसका इतिहास इसके नाम के मुताबिक ही खौफनाक है। शेरशाह सूरी के काल में बना यह दरवाजा कभी 'काबुली दरवाजा' के नाम से जाना जाता था, लेकिन वक्त के साथ इसकी दीवारों पर खून के जो धब्बे लगे, उसने इसे हमेशा के लिए 'खूनी दरवाजा' बना दिया।

शेरशाह सूरी से ब्रिटिश राज तक का सफर

इस भव्य दरवाजे का निर्माण 16वीं शताब्दी में अफगान शासक शेरशाह सूरी ने करवाया था। उस समय यह शहर के मुख्य द्वारों में से एक था और काबुल जाने वाले रास्ते पर होने के कारण इसे काबुली दरवाजा कहा जाता था। हालांकि इतिहास की क्रूरता ने इसका नाम बदल दिया। यह दरवाजा मुगल सल्तनत के उत्थान और पतन, दोनों का मूक गवाह रहा है।

1857 का विद्रोह और मुगल वंश का खौफनाक अंत

खूनी दरवाजे के इतिहास का सबसे काला अध्याय 22 सितंबर 1857 को लिखा गया। यह वह दौर था जब भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम अपने चरम पर था। और ब्रिटिश सेना दिल्ली पर दोबारा कब्जा करने की कोशिश कर रही थी।

मुगल शहजादों की गिरफ्तारी

अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर ने अपने बेटों मिर्जा मुगल, खिज्र सुल्तान तथा पोते अबू बकर के साथ हुमायूं के मकबरे में शरण ली हुई थी।

विश्वासघात और गिरफ्तारी

किसी मुखबिर की सूचना पर ब्रिटिश जनरल विलियम हॉडसन ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया। हॉडसन ने बादशाह को आश्वासन दिया कि शहजादों पर निष्पक्ष मुकदमा चलाया जाएगा।

रास्ते में कत्लेआम

जनरल हॉडसन तीनों शहजादों को बैलगाड़ी में बिठाकर लाल किले की ओर ले जा रहा था। जब वे इस दरवाजे (काबुली दरवाजे) के पास पहुंचे, तो हॉडसन ने अचानक गाड़ी रुकवाई।

क्रूरता की पराकाष्ठा

हॉडसन ने तीनों शहजादों को गाड़ी से उतारा, उनके कपड़े उतरवाए और उन्हें सरेआम गोलियों से भून दिया। उनकी हत्या के बाद, शवों को उसी हालत में ले जाकर कोतवाली के सामने प्रदर्शित किया, ताकि जनता के मन में खौफ पैदा किया जा सके।

आज ऐसे स्थिति में खूनी दरवाजा 

आज खूनी दरवाजा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में है। फिरोज शाह कोटला मैदान के पास स्थित यह स्मारक दिल्ली की उन चुनिंदा इमारतों में से एक है, जो हमें याद दिलाती है कि आजादी की कीमत कितनी भारी थी। और सत्ता के संघर्ष में इतिहास कैसे लहूलुहान हुआ।


दिल्ली के खूनी दरवाज़े (Khooni Darwaza) तक पहुँचने के लिए आप मेट्रो (दिल्ली गेट स्टेशन), बस, ऑटो या टैक्सी का इस्तेमाल कर सकते हैं। यह बहादुरशाह ज़फ़र मार्ग पर, दिल्ली गेट और फिरोज शाह कोटला मैदान के पास स्थित है। इसे ढूँढना आसान है क्योंकि यह मौलाना आज़ाद मेडिकल कॉलेज के सामने है। यहां पहुंचने के लिए मेट्रो, बस और टैक्सी व आटो भी ले सकते हैं।

ऐसे आसानी से यहां पहुंच सकते

मेट्रो (Metro) : दिल्ली गेट मेट्रो स्टेशन (Delhi Gate Metro Station) सबसे नज़दीकी है (लाइन 3/4)। स्टेशन से उतरकर आप कुछ ही दूरी पर पैदल या ऑटो लेकर यहां पहुँच सकते हैं।

बस (Bus) : DTC की कई बसें (जैसे 403, 425, 502, D-054) खूनी दरवाज़े के पास से गुजरती हैं। आप दिल्ली के किसी भी हिस्से से बस लेकर यहाँ आ सकते हैं।

टैक्सी/ऑटो रिक्शा (Taxi/Auto Rickshaw) : आप ऑटो या टैक्सी (Uber/Ola जैसी ऐप-आधारित कैब भी) लेकर सीधे बहादुरशाह ज़फ़र मार्ग पर उतर सकते हैं। इस मार्ग पर ही यह खूनी दरवाजा स्थित है।

रेल मार्ग (Railway) : नज़दीकी रेलवे स्टेशन नई दिल्ली रेलवे स्टेशन (NDLS) है। स्टेशन से आप टैक्सी या ऑटो लेकर खूनी दरवाज़े तक पहुँच सकते हैं।

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