Uttarakhand Folk Culture : लखनऊ में गूंजे कुमाऊँनी और गढ़वाली होली के स्वर, संजोया 'अपनी बोली-अपनी होली' का संकल्प

लखनऊ के कुर्मांचल नगर में उत्तराखण्ड महापरिषद द्वारा पारम्परिक बैठकी और खड़ी होली 2026 का भव्य आयोजन। जानें सांस्कृतिक कार्यक्रम, सहभागी टीमों और गणमान्य अतिथियों के बारे में पूरी जानकारी। 

प्रारब्ध न्यूज ब्यूरो, लखनऊ 

​उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में लघु उत्तराखण्ड की झलक तब देखने को मिली जब उत्तराखण्ड महापरिषद, लखनऊ द्वारा पारम्परिक बैठकी एवं खड़ी होली उत्सव का भव्य आयोजन किया गया। रविवार, 01 मार्च 2026 को लखनऊ के कुर्मांचल नगर स्थित उत्तराखण्ड महापरिषद भवन में आयोजित कार्यक्रम ने न केवल रंगों के पर्व का उल्लास बिखेरा, बल्कि प्रवासी उत्तराखण्डियों के बीच अपनी जड़ों और संस्कृति के प्रति जुड़ाव को और भी गहरा कर दिया। उत्तराखण्ड महापरिषद लखनऊ होली उत्सव 2026।

बैठकी व खड़ी होली परम्परा का अनूठा समागम

​उत्तराखण्ड की होली केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि यह शास्त्रीय संगीत, लोकगायन और सामूहिक सहभागिता का एक अद्भुत मिश्रण है। महापरिषद प्रांगण में आयोजित इस उत्सव में दोपहर 03:00 बजे से ही होलियारों का जमावड़ा शुरू हो गया था।

​कार्यक्रम में महिला एवं पुरुष होलियारों की टोलियों ने अपनी प्रस्तुतियों से लखनऊ की शाम को पहाड़ी रंगों में सराबोर कर दिया। जहाँ 'बैठकी होली' में राग-रागिनियों पर आधारित आध्यात्मिक गीतों की प्रधानता रही, वहीं 'खड़ी होली' में ढोल-दमाऊँ की थाप पर थिरकते होलियारों ने कुर्मांचल और केदारखंड की सजीव झांकी प्रस्तुत की।

गूंजे पारम्परिक होली के गीत

​उत्सव के दौरान हवाओं में भक्ति और उल्लास का ऐसा मिश्रण घुला कि हर कोई मंत्रमुग्ध हो उठा। होलियारों द्वारा गाए गए प्रमुख गीतों ने कार्यक्रम की रौनक बढ़ा दी:

  • "जोगी आयो शाहर में व्योपारी"
  • "शिव के मन माही बसे काशी"
  • "सिद्धी को दाता विघन विनाशक"
  • "रंग में होली कैसे खेलूगी सावरिया के संग"

इन गीतों के माध्यम से न केवल भगवान शिव और गणेश की वंदना की गई, बल्कि ब्रज और पहाड़ के अटूट सांस्कृतिक संबंधों को भी दर्शाया गया।

सहभागी टीमें और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व

​लखनऊ के विभिन्न कोनों से आए उत्तराखण्ड मूल के परिवारों ने इस आयोजन को सफल बनाया। महिला होलियारों की सशक्त टीमों ने अपनी सुरमयी उपस्थिति दर्ज कराई। प्रमुख भागीदारी वाले क्षेत्रों में शामिल रहे।

  • ​कल्याणपुर, पंतनगर, विकासनगर, और इंद्रानगर।
  • ​तेलीबाग, सुगामऊ, महानगर, और राजाजीपुरम।
  • ​नीलमत्था, खड़गापुर, भरतनगर, मायापुरी, पीजीआई, तकरोही और गोमती नगर।

​इन सभी क्षेत्रों से आए समूहों ने अपनी क्षेत्रीय विशिष्टता के साथ होली गायन किया, जिससे विविधता में एकता का संदेश प्रसारित हुआ।

प्रमुख गणमान्य व होलियार मौजूद रहे 

​उत्तराखण्ड की समृद्ध लोकपरंपरा को जीवित रखने के संकल्प के साथ कार्यक्रम में  विशिष्ट लोग उपस्थित रहे।

प्रमुख महिला होलियार

अरूणा उपाध्याय, हरितिमा पंत, शशी जोशी, सुशीला नेगी, पुष्पा वैष्णव, कमला चुफाल, मीना अधिकारी, पूनम कनवाल, सविता बिष्ट, दीपा कालाकोटी, हेमा बिष्ट, मंजू पाण्डेय, सरोज खुलबे और पुष्पा गैलाकोटी।

पुरुष होलियार एवं अन्य सहयोगी

सुन्दर पाल सिंह बिष्ट, किशोर काठोरी, पान सिंह, दर्शन सिंह परिहार, सी.एम. जोशी और भुवन पाठक।

सभी ने एक स्वर में “अपनी बोली - अपनी होली - अपनी संस्कृति” के नारे को बुलंद किया और संकल्प लिया कि आधुनिकता के दौर में भी वे अपनी जड़ों को कभी नहीं भूलेंगे।

प्रबन्धन एवं आयोजक मण्डल

​कार्यक्रम की सफलता के पीछे उत्तराखण्ड महापरिषद के समर्पित पदाधिकारियों का कुशल मार्गदर्शन रहा। इस अवसर पर परिषद के निम्नलिखित पदाधिकारी और गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे, जिसमें उत्तराखण्ड महापरिषद के संयोजक दीवान सिंह अधिकारी, अध्यक्ष हरीश चन्द्र पन्त, वरिष्ठ उपाध्यक्ष मंगल सिंह रावत, महासचिव भरत सिंह बिष्ट, सांस्कृतिक सचिव महेन्द्र सिंह गैलाकोटी व सचिव राजेश बिष्ट उपस्थित रहे। इसके अतिरिक्त भुवन पटवाल, राजेन्द्र सिंह बिष्ट, सुरेश पाण्डेय, कमल जोशी, विजय बिष्ट, पंकज खर्कवाल, सुरेश जोशी, रमेश चन्द्र सिंह अधिकारी, पूरन भदोला और संदीप सहित कई अन्य स्वयंसेवक और सदस्य मौजूद रहे।

होली की शुभकामनाएं 

महापरिषद के अध्यक्ष हरीश चन्द्र पन्त ने सभी आगंतुकों का स्वागत किया और विभिन्न क्षेत्रों (जैसे पन्त नगर, तेलीबाग, गोमती नगर आदि) से आए होलियारों को होली की हार्दिक बधाई दी। 

"यह आयोजन मात्र एक उत्सव नहीं है, बल्कि हमारी भावी पीढ़ी को यह सिखाने का एक जरिया है कि हमारी संस्कृति कितनी समृद्ध है। लखनऊ जैसे महानगर में अपनी लोकपरंपरा को अक्षुण्ण रखना हम सभी का दायित्व है।" - हरीश चन्द्र पन्त, अध्यक्ष, उत्तराखंड महापरिषद।

सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण

उत्तराखण्ड महापरिषद द्वारा आयोजित यह होली उत्सव उल्लास, उमंग और हृदयस्पर्शी अनुभूतियों का सजीव दस्तावेज बन गया। ग्रामीण और सुदूर अंचलों की इस पारम्परिक होली ने यह सिद्ध कर दिया कि भौतिक दूरियां सांस्कृतिक जुड़ाव को कम नहीं कर सकतीं। ढोल-दमाऊँ की थाप और अबीर-गुलाल के बीच यह कार्यक्रम एकता और सौहार्द के जीवंत प्रतीक के रूप में संपन्न हुआ।

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