Spritual Story : जब चंद्रमा की सुन्दरता पर मुग्ध हो गईं राजा दक्ष की 27 पुत्रियां

प्रारब्ध अध्यात्म डेस्क, लखनऊ


शिव पुराण के अनुसार राजा दक्ष की सत्ताइस पुत्रियां चंद्रमा की सुंदरता पर मुग्ध हो गईं। वे सभी चंद्रमा से विवाह करना चाहती थीं। राजा दक्ष ने उन्हें बहुत समझाया कि सगी बहनों का एक ही पति होने से दांपत्य जीवन में बाधा आएगी, लेकिन चंद्रमा के प्रेम में पागल दक्ष पुत्रियां अपनी जिद पर अड़ी रहीं।


अश्विनी सबसे बड़ी पुत्री थी। उन्होंने कहा कि पिताजी हम आपस में मेल जोल से मित्रव्रत रहेंगे। आपको कोई शिकायत नहीं मिलेगी। दक्ष ने अपनी सत्ताइस कन्याओं का विवाह चंद्रमा से कर दिया। चंद्रमा और उनकी पत्नियां बहुत प्रसन्न थे। लेकिन यह खुशियां ज्यादा दिनों तक नहीं टिकी। जल्द ही, चंद्रमा सत्ताइस बहनों में से एक रोहिणी पर ज्यादा मोहित हो गए और अन्य पत्नियों की उपेक्षा करने लगे।

        
राजा दक्ष को जब यह बात पता चली तो उन्होंने चंद्रमा को समझाया। कुछ दिनों तक तो सब ठीक रहा लेकिन जल्द ही रोहिणी पर उनकी आसक्ति पहले से ज्यादा तेज हो गई।

     
अन्य पुत्रियों के विलाप से दुखी दक्ष ने फिर चंद्रमा से बात की। लेकिन उन्होंने इसे अपना निजी मामला कहकर दक्ष का अपमान कर दिया। दक्ष प्रजापति थे। कोई भी देवता उनका अनादर नहीं करता था।दक्ष ने क्रोधित होकर चंद्रमा को श्राप दिया कि तुम छह रोग से पीड़ित हो जाओ।


दक्ष के श्राप से चंद्रमा, क्षय रोग से ग्रस्त होकर धूमिल हो गए। उन की चमक समाप्त हो गई। पृथ्वी की गति बिगड़ने लगी। ऋषि- मुनि और देवता परेशान होकर भगवान बृह्मा की शरण में गए।

      
ब्रह्मा जी, राजा दक्ष के पिता थे। लेकिन दक्ष के श्राप को समाप्त कर पाना उनके बस में नहीं था। उन्होंने देवताओं को शिव जी की शरण में जाने का सुझाव दिया। ब्रह्मा जी ने कहा, चंद्र देव भगवान शिव को प्रसन्न करें, दक्ष पर उनके अलावा किसी का वस नहीं चल सकता। ब्रह्मा जी की सलाह पर चंद्रमा ने शिवलिंग बनाकर तप का आरंभ किया।


महादेव प्रसन्न हुए और चंद्रमा से वरदान मांगने को कहा। चंद्रमा ने शिवजी से अपने सभी पापों के लिए क्षमा मांगते हुए क्षय रोग से मुक्ति का वरदान मांगा। भगवान शिव ने कहा जिसने श्राप दिया है वह साधारण व्यक्ति नहीं है। उस के श्राप को समाप्त करना संभव नहीं है, फिर भी मैं तुम्हारे लिए कुछ ना कुछ जरूर करूंगा।     


महादेव बोले, एक माह में दो पक्ष होते हैं। उसमें से एक पक्ष में तुम मेरे वरदान से निखरते जाओगे, लेकिन दक्ष के श्राप के प्रभाव से दूसरे पक्ष में क्षीण होते जाओगे। शिव के वरदान से चंद्रमा, शुक्ल पक्ष में तेजस्वी रहते हैं और कृष्ण पक्ष में धूमिल हो जाते हैं।


चंद्रमा की स्तुति से महादेव जिस स्थान पर निराकार से साकार हो गए थे उस स्थान की देवो ने पूजा की और वह स्थान सोमनाथ के नाम से विख्यात हुआ। चंद्रमा की वे सत्ताइस पत्नियां ही सत्ताइस विभिन्न नक्षत्र हैं।

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