सुभाषचंद्र बोस की 125वीं जयंती पर विशेष : नेताजी ने कहा था कि आजादी भीख मांगने से नहीं, छीनना पड़ेगा

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1942 में बलिया, मिदनापुर व सतारा ने दिया था नेताजी का पूरा साथ


बलिया के लोगों ने अपने घरों पर नेताजी की मूर्ति लगाकर दिया सम्मान




सत्येंद्र राय, बलिया


स्वराज का अधिकार मांगने से नहीं मिलते उसे छीनना पड़ेगा। दिल्ली चलो 05 जुलाई 1943 को सिंगापुर के टाऊनहाल मैदान में आजाद हिंद फौज के सर्वोच्च कमाण्डर की हैसियत से सलामी लेने के बाद भारत के भू-भाग वर्मा अब म्यांमार, कोहिमा और इंफाल पर कब्जा कर लेने वाले नेताजी सुभाषचंद्र बोस की सशस्त्र बगावत की बदौलत ब्रितानिया हुकूमत को भारत छोड़कर जाना पड़ा था।


साहित्यकार शिवकुमार सिंह कौशिकेय ने बताया कि जब वर्ष 1942 में बलिया जिले की जनता ने थानों, डाकघरों, रेलवे स्टेशनों को लूट फूंक दिया। रेल पटरियों को उखाड़ दिया था, पुलों को तोड़ दिया था तो तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व के अहिंसावादी सभी नेताओं इस घटना से पल्ला झाड़ लिया था। इसे अराजकता फैलाने की साजिश करार दिया था। हालांकि इस विद्रोह में नरम दल-गरम दल दोनों धड़े के कार्यकर्ता शामिल हुए थे।


सिंगापुर से नेताजी ने उस समय बलिया, मिदनापुर, सतारा जिले की जनता की पीठ थपथपाई थी। उन्होंने स्पष्ट कह दिया था कि आजादी भीख मांगने से नहीं मिलेगी, इसे छीनना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है जब पूर्वी एशिया में रह रहे 30 लाख भारतीय सभी उपलब्ध संसाधनों को एकत्रित कर के एक साथ इकट्ठे हों। आधे-अधूरे संसाधनों से काम नहीं चलेगा। वित्त भी चाहिए और मानव संसाधन भी हमारी ज़रूरत है। मैं 3 लाख सैनिकों को अपने साथ देखना चाहता हूँ और 3 करोड़ डॉलर भी।


अस्थाई सरकार को 11 दिशों की मान्यता


भारत की स्वतंत्रता के लिए सशस्त्र संघर्ष करने वाले आजाद हिंद फौज के सुप्रीम कमाण्डर के रूप में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने 21 अक्तूबर 1943 को ही स्वतंत्र भारत की अस्थाई सरकार बनाया था, जिसे जर्मनी, जापान, फिलीपींस, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुको और आयरलैंड सहित 11 देशों ने मान्यता दिया था ।


जापान से मिला अंडमान-निकोबार द्वीप


जापान ने अंडमान व निकोबार द्वीप नेताजी को प्रदान किया था, जिनका नामकरण उन्होंने किया था। यही से उन्होंने भारत के स्वतंत्र राष्ट्राध्यक्ष सेनापति के रूप में ब्रिटिश साम्राज्य की सेना से भारत के वर्मा, कोहिमा सहित अनेक राज्यों को स्वतंत्र करा लिया था।


अहिंसा का वास्ता देकर बापू ने किया मना


6 जुलाई 1944 को उन्होंने रंगून रेडियो स्टेशन से महात्मा गाँधी के नाम से एक प्रसारण जारी कर इस निर्णायक युद्ध में विजय के लिए सहयोग एवं आशीर्वाद मांगा था। अहिंसा का वास्ता देकर बापू ने मना कर दिया था। बापू के मना करने के बाद भी हजारों लोगों ने नेताजी के कदम देश की आजादी के युद्ध को सही ठहराते हुए आजाद हिंद फौज में भर्ती हो गए थे।


आजाद हिंद फौज में भर्ती हुए थे 28 सैनिक


श्री कौशिकेय ने बताया कि बलिया जिले से भगवान देव सिंह, रामदेव सिंह, सरजू सिंह, सूर्यदेव सिंह, बैजनाथ सिंह, विक्रमा सिंह, अब्दुल गफ्फूर, अनवर हुसैन, रामचन्द्र यादव, श्रीराम पाठक, बृजकिशोर उपाध्याय, कपिल देव तिवारी, गजाधर राम, गया सिंह, कैलाश सिंह, तारकेश्वर चौबे, जगन्नाथ सिंह, रामाज्ञा सिंह, शुभ नारायण सिंह, अनवर हक़, दूबर चौबे, विश्वनाथ सिंह, धनुषधारी सिंह, सुदामा प्रसाद, हरिकिशन चौधरी, भैरों सिंह, अवधेश कुमार पांडेय, रामनाथ तिवारी समेत 28 लोग आजाद हिंद फौज में भर्ती हुए थे।


पराक्रम दिवस का कलेक्ट्रेट में आयोजन आज


रविवार को नेताजी की 125वीं जयंती पर कलेक्ट्रेट परिसर में नेताजी के स्मारक पर पराक्रम दिवस का आयोजन किया गया है। उस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सीडीओ प्रवीण वर्मा एवं विशिष्ट अतिथि सीआरओ विवेक कुमार श्रीवास्तव होंगे।

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