Worship of Suryadev removes sufferings, gets happiness and prosperity: सूर्यदेव के पूजन से कष्टों का होता निवारण



प्रारब्ध अध्यात्म डेस्क, लखनऊ


हिंदू धर्म ग्रंथों की मान्यता के अनुसार सूर्य देवता को जगत की आत्मा माना जाता है। चंद्रमा और सूर्य दोनों ऐसे देवता हैं जो प्रत्यक्ष रूप से दृष्टिगोचर हैं। सूर्य देव पृथ्वी पर अंधकार का नाश करते हैं। सूर्य पद, प्रतिष्ठा, नौकरी, कीर्ति, धन आदि का कारक होते हैं।


सूर्य देव को आरोग्य का देवता माना जाता है। सूर्य देव की विधि विधान से पूजा-अर्चना करने पर जीवन में सफलता, मानसिक शांति मिलती है। उनकी पूजा करने से शरीर स्वस्थ और व्यक्ति के अंदर शक्ति का संचार होता है।


सूर्य देव की पूजा विधि


सूर्य देव की पूजा में अर्ध्यदान का विशेष महत्व होता है। रविवार के दिन प्रातः काल तांबे के लोटे में जल लेकर और उसमें लाल फूल, चावल डालकर प्रसन्न मन से सूर्य मंत्र का जाप करते हुए सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए। अर्ध्यदान से सूर्य देव प्रसन्न होकर आयु, आरोग्य, धन,धान्य, पुत्र, मित्र, तेज, यश, विद्या, वैभव और सौभाग्य को प्रदान करते हैं।


रविवार का व्रत समस्त पापों को नष्ट करने वाला है। धर्म ग्रन्थों में इस दिन सूर्य का पूजन-अर्चन का  काफी महत्व बताया गया है। इस व्रत को करने से मनुष्य के सभी कष्ट, नष्ट हो जाते हैं और मनुष्य जीवन के सभी सुखों को अच्छे से भोग करने का अधिकारी हो जाता है।


पौराणिक ग्रंथों के अनुसार में रविवार के व्रत को समस्त पापों का नाश करने वाला माना गया है।


अच्छे स्वास्थ्य व घर में समृद्धि की कामना के लिए भी रविवार का व्रत किया जाता है।


पूजा के बाद भगवान सूर्य देव को याद करते हुए तेल रहित भोजन करना चाहिए। एक वर्ष तक नियमित रूप से उपवास रखने के पश्चात व्रत का उद्यापन करना चाहिए। मान्यता है कि इस उपवास को रखने से, उपासक जीवन पर्यंत तमाम सुखों का भोग करता है।

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