दिनांक 26 अगस्त, गुरुवार
विक्रम संवत : 2078 (गुजरात - 2077)
शक संवत : 1943
अयन : दक्षिणायन
ऋतु - शरद
मास - भाद्रपद (गुजरात एवं महाराष्ट्र अनुसार - श्रावण)
पक्ष - कृष्ण
तिथि - चतुर्थी शाम 05:13 तक तत्पश्चात पंचमी
नक्षत्र - रेवती रात्रि 10:29 तक तत्पश्चात अश्विनी
योग - गण्ड 27 अगस्त प्रातः 05:26 तक तत्पश्चात वृद्धि
राहुकाल - दोपहर 02:15 से शाम 03:50 तक
सूर्योदय - 06:21
सूर्यास्त - 18:58
दिशाशूल - उत्तर दिशा में
व्रत और पर्व
एकादशी
03 सितंबर : अजा एकादशी
17 सितंबर : परिवर्तिनी एकादशी
प्रदोष
04 सितंबर : शनि प्रदोष
18 सितंबर : शनि प्रदोष व्रत
पूर्णिमा
20 सितंबर : भाद्रपद पूर्णिमा
अमावस्या
07 सितंबर : भाद्रपद अमावस्या
पंचक
22 अगस्त प्रात: 7.57 बजे से 26 अगस्त रात्रि 10.28 बजे तक
18 सितंबर दोपहर 3.26 बजे से 23 सितंबर प्रात: 6.45 बजे तक
व्रततिथि - तृतीया शाम 04:18 तक तत्पश्चात चतुर्थी
नक्षत्र - उत्तर भाद्रपद रात्रि 08:48 तक तत्पश्चात रेवती
योग - शूल 26 अगस्त प्रातः 05:25 तक तत्पश्चात गण्ड
राहुकाल - दोपहर 12:41 से दोपहर 02:16 तक
सूर्योदय - 06:21
सूर्यास्त - 19:00
दिशाशूल - उत्तर दिशा में
व्रत पर्व विवरण -
विशेष - चतुर्थी को मूली खाने से धन का नाश होता है।(ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)
जन्माष्टमी
30 अगस्त 2021 सोमवार को जन्माष्टमी है ।
भारतवर्ष में रहनेवाला जो प्राणी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का व्रत करता है, वह सौ जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है | - ब्रह्मवैवर्त पुराण
गर्भवती देवी के लिये–जन्माष्टमी व्रत
जो गर्भवती देवी जन्माष्टमी का व्रत करती हैं। उसका गर्भ ठीक से पेट में रह सकता है और ठीक समय जन्म होता है।ऐसा भविष्यपुराण में लिखा है|
जन्माष्टमी के दिन किया हुआ जप अनंत गुना फल देता है । उसमें भी जन्माष्टमी की पूरी रात, जागरण करके जप-ध्यान का विशेष महत्व है ।
भविष्य पुराण में लिखा है कि जन्माष्टमी का व्रत अकाल मृत्यु नहीं होने देता है । जो जन्माष्टमी का व्रत करते हैं, उनके घर में गर्भपात नहीं होता ।
एकादशी का व्रत हजारों - लाखों पाप नष्ट करनेवाला अदभुत ईश्वरीय वरदान है लेकिन एक जन्माष्टमी का व्रत हजार एकादशी व्रत रखने के पुण्य की बराबरी का है ।
एकादशी के दिन जो संयम होता है उससे ज्यादा संयम जन्माष्टमी को होना चाहिए ।
बाजारु वस्तु तो वैसे भी साधक के लिए विष है लेकिन जन्माष्टमी के दिन तो चटोरापन, चाय, नाश्ता या इधर - उधर का कचरा अपने मुख में न डालें ।
इस दिन तो उपवास का आत्मिक अमृत पान करें ।अन्न, जल, तो रोज खाते - पीते रहते हैं, अब परमात्मा का रस ही पियें । अपने अहं को खाकर समाप्त कर दें।
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