कर्नल साहब की दाढ़ी



*अजय शुक्ल*
थोड़ी-सी लंबी पर करीने से छंटी सफेद दाढ़ी। वैसे ही धवल, रेशमी बाल। छरहरी काया और छह फुट को छूता क़द। कर्नल कालरा जब शाम के वक़्त अद्धी का कुर्ता और अलीगढ़-कट पाजामा पहन कर टहलने निकलते तो वे रिटायर फ़ौज़ी कम मक़बूल फिदा हुसैन ज़्यादा लगते थे। फ़ौज़ीपन का ज़रा-सा स्वैग ज़रूर था जो 70 साल की उम्र के बावजूद चाल में बरकरार था।

सुबह-शाम रोज़ घूमने निकलते थे। हाथ मे एक बड़ी-सी पुड़िया लेकर। पुड़िया में  आटे और चीनी का मिक्स्चर होता था। जहां कहीं चीटियों की कतार दिखती, वे थोड़ा-सा मिक्स्चर बुरक देते।

उस शाम भी वे चीटियों को चीनी-आटा खिलाकर ही लौट रहे थे। थोड़ा धुंधलका था, जो स्ट्रीटलाइट के खराब होने के कारण ने गहरा गया था। अचानक पीछे से उन्हें किसी ने ज़ोर का धक्का दिया। वे मुंह के बल गिरे। उठने की कोशिश कर ही रहे थे कि पसलियों पर एक किक पड़ी। किक के साथ ही किसी ने मां की गाली बकीxxxx...बाबर की औलाद। तभी एक मजबूत हाथ ने उन्हें गिरेबान से खींचा और झटके के साथ उठाकर बिठा दिया। उन्होंने देखा, चार-पांच लड़के उन्हें घेरे खड़े हैं।

"कहो, चच्चा...तबीयत कैसी है?" एक लफंगे ने उनकी दाढ़ी खींचकर सवाल किया, "चमनगंज छोड़कर यहां कहां टहल रहे हो?

कर्नल साहब का उत्तर देने का मन नहीं हो रहा था। पर वे फ़ौज़ी भी थे। हालात की नज़ाक़त भांपते हुए वे बोले, " मैं तो यहीं पास में रहता हूं। सिविल लाइन में। मेथडिस्ट चर्च के पास।"

"अच्छा! तो तुम लोग यहां तक आ बसे? ओके...अब जरा बोलो तो 'जय श्रीराम'..और ज़रा ज़ोर से बोलना।"

कर्नल साहब राम का नाम क्या, रामायण की कई चौपाइयां और दोहे सुना सकते थे। सुंदरकांड सुना सकते थे। लेकिन यह थोपी हुई धार्मिकता उनसे बर्दाश्त न हुई। दहाड़कर बोले, "नहीं कहता जी...जाओ जो करते बने कर लो..."

"ये ऐसे न मानेगा...ज़रा गांधी जी की लाठी तो देना पप्पू..."

मगर इसके पहले कि लाठी चल पाती, सामने से कुछ लोग आते दिखाई दिए। तिलंगे भाग खड़े हुए। कर्नल साहब उठे और लंगड़ाते हुए घर को चल दिए। मुंह पर कुछ गीला-सा महसूस हो रहा था। उन्होंने हाथ से पोछा।हाथ में खून आ गया। वे मुस्कराए और दाढ़ी पर हाथ फिराकर खुद से बोले...देखा बापू मैंने अहिंसा नहीं छोड़ी!

कर्नल साहब का सन् 2000 में फौज़ से 54 साला रिटायरमेन्ट  हुआ था। तब तक उनकी बेटी बर्कले में प्रोफेसर हो चुकी थी और बेटा बेंगलुरु की एक एमएनसी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर था। वे कानपुर ही बसना चाहते थे लेकिन रिटायरमेन्ट से एक महीने बाद जब उनकी पत्नी कैंसर से चल बसीं तो उन्होंने प्लान बदल दिया।
पहले थोड़ी घुमक्कड़ी कर लेते हैं–उन्होंने खुद से कहा। अमेज़न और अफ्रीका के जंगल देखने की इच्छा उनकी बचपन से थी। वे बच्चों के लाख समझाने पर भी न माने।सो, कई साल तक ब्राज़ील, पेरू, कोलंबिया और इक्वाडोर में वर्षावनों में एनाकोंडा से आंखें लड़ाते रहे।फिर, उन्होंने अफ्रीका का रुख किया और लेक विक्टोरिया के किनारे डेरा डाल दिया। बरसों तक केन्या, युगांडा, रवांडा और बुरुंडी में जंगली जानवरों से इश्क फरमाते रहे।
लेकिन, अफ्रीका से उन्हें लौटना पड़ा। एक रात मसाई मारा में एक शेरनी उनके टेन्ट में घुस आई। दोनों के बीच भीषण मल्ल युद्ध हुआ। जीत कर्नल साहब की ही हुई। उन्होंने अपनी खुखरी शेरनी के दिल मे पैबस्त कर दी। लेकिन, दम तोड़ने से पहले शेरनी ने भी उन्हें मरणासन्न कर दिया। नैरोबी में डॉक्टर उन्हें बड़ी मुश्किल से बच पाए। उनका घुटना बदलना पड़ा। 
इस हालत में उन्हें बेटी के पास बर्कले में जाकर रहना पड़ा। पर बिना स्थायी वीज़ा के कोई कब तक अमेरिका में रह सकता था? उन्हें बेटे के पास बेंगलुरु आना पड़ा। लेकिन तीन साल बाद बेटे की बदली सिलिकॉन वैली को हो गई। अब उन्होंने मातृभूमि में रहने का फैसला कर लिया। बेटे को दिल्ली हवाई अड्डे पर उन्होंने अमेरिका के लिए विदा किया और खुद नई दिल्ली स्टेशन पहुंचकर कानपुर शताब्दी में जा बैठे।

वे कानपुर में ही पैदा हुए थे।  सिविल लाइन में पले-बढ़े। पास ही जीएनके कॉलेज से इंटर किया। वहीं से वे एनडीए के लिए सेलेक्ट होकर खड़कवासला, पुणे चले गए थे। फिर वे कभी कानपुर नही बस पाए पर कानपुर उनके भीतर हमेशा बसा रहा।

घर बीस साल से बन्द पड़ा था। पिता की डेथ के बाद वहां कोई रहा ही न था। सो, साफ-सफाई में, रंगाई-पुताई और फर्निशिंग में चार-पांच दिन लग गए। फिर एक दिन अपनी नेमप्लेट लगवा कर कर्नल साहब आकर बस गए। मगर अब पड़ोस में रहने वाला ऐसा कोई न था जो उन्हें जानता हो। उनके बचपन के परिचितों में कुछ लोग ऊपर उठ चुके थे और कुछ समाज में ऊपर उठकर 

लोगों ने कर्नल साहब को उनकी नेमप्लेट से ही जाना:

Col (rtd) Jaswant Kalra

कुछ ही दिनों में आर्मी का रोमांस मोहल्ले के किशोरों को कर्नल साहब की तरफ खींचने लगा। इनमें कुछ लड़के एनडीए की तैयारी कर रहे थे। कुछ राष्ट्रभक्ति के जुनून के वशीभूत होकर फौज़ के प्रति कृतज्ञता महसूस करते थे। ये लड़के उनके पास जंग के किस्से सुनने को आने लगे। फिर दो-तीन रिटायर्ड बुजुर्ग भी आकर्षित हुए।  इनको वे रामायण, महाभारत और दूसरे पुराणों का ज्ञान पिलाते और विदा करने से पहले आर्मी कैंटीन की दो पेग दारू। दारू पीते वक़्त वे मेज़ पर रखे गांधी जी के बस्ट का चेहरा दीवार की तरफ कर देते। "बापू सॉरी" कहकर कान पकड़ते और मुस्कराकर सिप करने लगते।
कर्नल साहब का बैठका गुलज़ार रहने लगा। कभी वे 1971 की जंग के किस्से सुनाते तो कभी कारगिल के।  या कभी कश्मीर के आतंकियों के साथ किसी मुठभेड़ का ज़िक्र छेड़ देते। इन महफिलों में एक सवाल बार-बार उठता: 

"सर, आपने यह मुसलमानों वाली दाढ़ी क्यों रखी है?रखनी ही है तो हिंदुओ के गर्व का ख्याल रखते हुए राजपूती मानमनोहर दाढ़ी रखिए...क्या यह शाहजहां-कट दाढ़ी रख ली–पाकिस्तानी। 

इन बातों को कर्नल साहब हंस के टाल देते। कहते, "हां भाई। पाकिस्तानी तो मैं हूं ही। माता-पिता तो मुल्तान से ही जान बचाकर कानपुर आए थे। असली घर तो वहीं है:
गांव बस्ती शेर मियानी, तहसील जलालपुर पीर वाला, ज़िला मुल्तान, पाकिस्तान।" फिर वे उस मुल्तान की ढेरों बातें बताते जो उन्होंने कभी देखा नहीं था। "काशी से भी पुराना है मेरा मुल्तान...कश्यप ऋषि ने बसाया था" वे बताया करते थे, "कभी मुल्तान का सोहन हलवा खाकर देखना, बाँदा वाले बोडेराम को भूल जाओगे।" अलबत्ता उन्होंने खुद कभी उसे नहीं खाया था। खेल-खेल में वे दो-एक वाक्य सरायकी के बोल देते, "के हाल हें, साईं?" फिर बताते, "यह सरायकी ज़बान है। मेरी मातृभाषा। सिर्फ पाकिस्तान में बोली जाती है। अब बताओ कि मैं पाकिस्तानी हूं या हिंदुस्तानी?"

उस शाम लफंगे लड़कों के हाथों पिटने के बाद कर्नल साहब देर तक विचार करते रहे। वे लड़के दशकों से बोए जा रहे नफ़रत के बीजों की फ़सल थे। उन्हें लगता था कि ज़ाम्बियों को सामान्य बनाया जा सकता है। वे दुर्दम्य आशावादी थे। गांधी पर उनकी अटूट आस्था थी। लोग गांधी दर्शन पर लिखते हैं, भाषण देते हैं। कर्नल साहब गांधी दर्शन जीते थे। मांसाहार छोड़ चुके थे। दूध वे बकरी का भी नहीं पीते थे। न मक्खन, न घी और न ही मिठाई या आइसक्रीम। 

पाप से घृणा करो, पापी से नहीं। यह उनके जीवन का ध्येय वाक्य था। नफ़रत उन्हें किसी से न थी। यह अवगुण तो उन्होंने जंग के मैदान में ही छोड़ दिया था। सन् 1971 की लड़ाई में उनके हाथों कई पाकिस्तानी मरे थे। पर गोली चलाते हुए भी वे यह बात कभी न भूले थे कि शत्रु भी किसी के घर का चिराग़ है। वे यह भी महसूस करते रहते थे कि उनके ऊपर गोली चलाने वाले की उनके साथ किसी किस्म की रंजिश नहीं है। कभी-कभी हंसते हुए कहते–मेरा बस चलता तो 'आर्म्स एंड द मैन' के कैप्टन ब्लुनशिली की तरह बुलेट की जगह ज़ेब में चॉकलेट लेकर चलता।

एक दिन जब महफ़िल में उनकी दाढ़ी पर फिर सवाल उठा तो उन्होंने दाढ़ी की कहानी बता दी:
"यह दाढ़ी मैंने रिटायरमेंट के बाद रखी थी। यह श्रद्धांजलि है उस पाकिस्तानी फ़ौज़ी अफसर के लिए जो बहुत बहादुर था...बहुत सुंदर था और जिसे मैंने अपने हाथों मारा था। उसकी दाढ़ी हू-ब-हू ऐसी ही थी। अलबत्ता काली।

"1971 की वॉर जब शुरू हुई तो मैं वेस्टर्न सेक्टर में तैनात था। नया-नया लेफ्टिनेंट बना था। जंग का पहला मौका था। बहुत जोश था। हमें लाहौर पहुंचने का हुक्म था। हम पाकिस्तानियों को खदेड़ते गए और बर्की तक जा पहुंचे। वहां से लाहौर बस 19 किलोमीटर था। मगर अभी बर्की पर तिरंगा फहराना बाक़ी था। कांटे की टक्कर के बाद पाकिस्तानियों का दम उखड़ने लगा। वे मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए।

"सामने बर्की थाना था, जिस पर पाकिस्तानी झंडा फहरा रहा था। तिरंगा गाड़ने के लिए हमें यह जगह मुफीद लगी। हम थाने की ओर बढ़ चले। अचानक थाने के पास की झाड़ियों से एक फ़ौज़ी नमूदार हुआ। उसके हाथ मशीन गन थी। गोलियों की बौछार हुई और मेरे चार जवान ज़मीन पर तड़पने लगे। हमारी तरफ से जवाबी फायरिंग हुई पर तब तक वह झाड़ियों के पीछे छिप गया।

"एक अकेला फ़ौज़ी मोर्चा ले रहा था। वह यह भी जनता था कि आखिरकार वह मारा जाएगा। पर होते हैं कुछ विलक्षण वीर जो मौत से नहीं कायरता से डरते हैं। लेकिन, उस वक़्त यह सब सोचने का वक़्त नहीं था। मैं अपने दाहिने बिजली की रफ्तार से भगा और गोलाई में दौड़ते हुए हमलावर के पीछे आ गया। कोई सौ मीटर की दूरी रही होगी। मैं अपनी कार्बाइन से उसे निशाने ले ही रहा था कि वह पलट गया। मैंने खुद को तत्काल ज़मीन पर गिरा लिया। गोलियों की बौछार मेरे ऊपर से गुज़र गई। 
"वह मुझे देख रहा था और मैं उसे। हम दोनों ने एक दूसरे पर निशाना साधा। मेरी गोली उसके कान के पास से निकली। उसकी गोली चली ही नहीं। वह मशीनगन को ठोकने-पीटने लगा। 
"यह डायरेक्ट एक्शन का वक़्त था। मैं 'हरहर महादेव' का उदघोष करते हुए संगीन तानकर उसकी ओर दौड़ पड़ा। जवाब में उसने 'पाकिस्तान जिंदाबाद' का नारा लगाया और हंटर्स नाइफ लेकर मेरी तरफ भाग। हम दोनों टकराए। कार्बाइन के आगे लगी संगीन भारी पड़ी। उसकी चाकू मेरे कंधे को छील भर पाई जबकि मेरी संगीन उसके पेट में पैबस्त हो गई। वह गिरा लेकिन दर्द में कराहने की जगह 'पाकिस्तान जिंदाबाद' का नारा लगाते हुए। मैंने अगले वार में उसकी छाती दाहिनी छेद दी। उसने मुट्ठी बांधकर  'पाकिस्तान ज़िंदाबाद' का नारा लगाया। अगला वार मैंने बाईं तरफ दिल पर किया। वह फिर मुट्ठी बांधकर बुदबुदाया 'पाकिस्तान ज़िंदाबाद'। उसके मुंह से झागदार खून बहने लगा था।

"मैं बुरी तरह थक गया था। मुंह सूख रहा था। मैंने पानी की बोतल निकाली। पीने जा ही रह था कि नज़र पाकिस्तानी पर चली गई। उसकी आंखें पानी की बोतल पर गाड़ी थीं। उसका दम उखड़ चुका था। मैंने बोतल से कुछ घूंट पानी उसके मुंह पर टपका दिए। उसने ओठों पर जीभ फिराकर और पानी मांगा। मैंने कुछ बूंदें और टपका दीं। उसने पलकें बन्द कर लीं और निश्चल हो गया। 
कर्नल साहब की आंखें गीली हो गईं। रूमाल से आंखें पोछते हुए उनके मुंह से निकल गया 'इन्ना लिल्लाही व इन्ना इलाही राजिऊन'। फिर श्रोताओं से मुखातिब होते हुए बोले, "ये क़ुरआन की लाइनें हैं। इनका मतलब है कि हम सब का सम्बंध अल्लाह से है और हम एक दिन उसी के पास चले जाते हैं।"

लफंगों के हाथ पिटने की कर्नल साहब ने भले ही थाने में रिपोर्ट न लिखाई हो मगर वे उस घटना को भूल नहीं पा रहे थे। किसी को उसकी दाढ़ी या धर्म के कारण कैसे पीटा जा सकता है? उनकी फ़ौज़ी ट्रेनिंग और अनुभव से इस सवाल का जवाब नहीं मिल पा रहा था। पर वे यह भी देख रहे थे कि उनकी दाढ़ी को वे भी नहीं पचा पाते थे जो शाम को उनके साथ दो पेग झाड़ते थे। 

पीटने वालों को कुछ तो गलती का अहसास होना ही चाहिए। एक दिन यही सोचते हुए कर्नल साहब थाने जा पहुंचे। संयोग से थानेदार अपने कार्यालय में मिल गए। उन्होंने उस दिन की पूरी बात बताई और कहा, "मैं बच्चों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई नहीं चाहता पर इतना अवश्य चाहता हूं कि आप एक दिन बुला कर उन्हें समझा दें। मुझे भी बुला लीजिएगा। में भी कोशिश करूंगा। शायद हृदय परिवर्तन हो जाए।"

थानेदार ने पूरी बात सुनी। फिर बोला, "ख़ान साहब, आपकी समस्या का समाधान बड़ा सरल है। आप दाढ़ी मुड़ा लीजिए। समस्या की जड़ वही है। आप कोई सिक्ख तो हैं नहीं कि केश कटाने पर कोई धार्मिक रोक हो। आप तो जानते ही हैं कि देश सैकड़ों साल की गुलामी से मुक्त हुआ है। लोग उत्साह में हैं। आज़ादी का जश्न है। ठीक है, दाढ़ी सुन्नत है। लेकिन आप ही बताइए: सुन्नत बड़ी कि जान?"

"लेकिन मैं..." कर्नल साहब ने कुछ कहने की कोशिश की लेकिन थानेदार ने मौका न दिया।

"अरे, छोड़िए ख़ान साहब...पहले मेरी बात सुन लीजिए...यह देखिए..." थानेदार ने मेज़ की दराज़ से एक नन्ही-सी किताब निकाली और बोले, "यह सुखमनी साहिब है। सुबह, दोपहर, शाम या रात। जब भी वक़्त मिलता है, एक बार जरूर इसका पाठ करता हूं। 

"हां, मैं सिक्ख हूं। 1984 में मेरे बाप को दाढ़ी और बाल के कारण इसी गोविंद नगर में ज़िंदा जला दिया गया था। उसी रात मेरी मां ने कैंची लेकर मेरे केश अपने हाथ से काट डाले थे। दाढ़ी-मूछ तब आई नहीं थी।"

कर्नल साहब घर लौट आए हैं। उन्होंने लड़ने का फैसला किया। उन्होंने खुद से कभी भी दाढ़ी न कटाने की प्रतिज्ञा कर डाली है। उन्हें कभी कभी कानों में 'पाकिस्तानी है' कमेंट भी सुनाई देता है। उनका बैठका अब भी गुलज़ार रहता है। वे किस्से सुनाते रहते हैं। उनको यकीन है कि उनके किस्सों से बदलाव आएगा। इन दिनों वे टैगोर का एक गीत बड़े मन से गाया करते हैं: 
चित्त जेथा भोय शून्नो, उच्चो जेथा शीर
ज्ञान जेथा मुक्तो जेथा गृहेर प्राचीर।
                      ------------

Post a Comment

0 Comments