Kanpur Farmers Protest New City Scheme कानपुर में 'न्यू सिटी योजना' के खिलाफ किसानों का गुस्सा फूटा। 23 दिनों से धरने पर बैठे किसानों ने KDA और भू-आधिपत्य विभाग पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए हैं। जानें क्या है पूरा मामला।
सत्ता पक्ष के जनप्रतिनिधियों ने साधी चुप्पी, KDA अधिकारियों ने कमेटी के नाम पर थमाया 'झुनझुना'
प्रारब्ध न्यूज ब्यूरो, कानपुर
उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में विकास की चमक के पीछे किसानों के आंसुओं की कहानी दबी हुई है। संभरपुर, हिन्दूपुर, गंगपुर और सिंहपुर गांवों के गरीब किसान पिछले 23 दिनों से भीषण गर्मी और तपती धूप में धरने पर बैठे हैं। मामला 'न्यू सिटी योजना' के लिए किए जा रहे भूमि अधिग्रहण का है, जिसे किसान अपनी जीविका और अस्तित्व पर प्रहार मान रहे हैं।
भ्रष्टाचार और तानाशाही के गंभीर आरोप
किसानों का सीधा आरोप है कि कानपुर विकास प्राधिकरण (KDA) और भू-आधिपत्य विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से उनकी कीमती जमीनें कौड़ियों के भाव हथियाने की साजिश रची जा रही है। किसानों का कहना है कि हमारी करोड़ों की जमीन को रद्दी के भाव लिया जा रहा है। एक तरफ बड़े रसूखदारों को फायदा पहुँचाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ गरीब किसान को दो वक्त की रोटी के लिए मोहताज बनाया जा रहा है।
अधिकारियों का वही पुराना 'कमेटी कार्ड'
हफ्तों से चल रहे इस आंदोलन को शांत करने पहुंचे अधिकारियों ने एक बार फिर वही पुराना रवैया अपनाया। किसानों की व्यथा सुनने के बजाय, प्रशासन ने एक कमेटी गठित करने का आश्वासन देकर मामले को ठंडे बस्ते में डालने की कोशिश की है। अधिकारियों का "एक हफ्ते में विचार करेंगे" वाला बयान किसानों के घावों पर नमक छिड़कने जैसा साबित हो रहा है।
प्रभावित क्षेत्र - मुख्य मांगें - प्रशासन का रुख
संभरपुर, हिन्दूपुर - उचित मुआवजा - कमेटी का गठन
गंगपुर, सिंहपुर - जबरन अधिग्रहण पर रोक - एक हफ्ते का समय
पूरी न्यू सिटी योजना - पारदर्शी नीति और सम्मान - टालमटोल की स्थिति
जनप्रतिनिधियों की बेरुखी से बढ़ा आक्रोश
हैरानी की बात यह है कि इस पूरे मामले में सत्ता पक्ष के स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने भी अपनी आंखें मूंद रखी हैं। किसानों का आरोप है कि चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे करने वाले नेता आज उनकी "चीख" सुनने को तैयार नहीं हैं।
किसान नेताओं की चेतावनी: 'यह अस्तित्व की लड़ाई'
धरने का नेतृत्व कर रहे किसान नेताओं ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि किसानों की मांगों को अनसुना किया गया, तो यह आंदोलन उग्र रूप ले सकता है।
कानूनी अधिकार : बिना किसान की सहमति के जमीन लेना कानूनन गलत है।
सम्मान की लड़ाई : यह अब सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि भविष्य और सम्मान का विषय है।
सड़क पर अन्नदाता : अगर किसान पूरी तरह सड़क पर उतरा, तो इसकी जिम्मेदारी शासन और प्रशासन की होगी।
न्याय की आस में सरकार की ओर देख रहे किसान
क्या कानपुर की 'न्यू सिटी योजना' सिर्फ कंक्रीट के जंगलों के लिए है? क्या विकास की इस दौड़ में गरीब किसान की बलि देना अनिवार्य है? किसान आज न्याय की आस में सरकार की ओर देख रहा है, लेकिन जवाब में उसे सिर्फ कमेटियों की फाइलें और आश्वासन मिल रहे हैं।

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