अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ एजेंडे को झटका देते हुए 1977 के इमरजेंसी कानून के तहत लगाए गए शुल्कों को रद्द कर दिया है। जानें भारत और दुनिया पर इसका क्या होगा असर।
ट्रंप के आर्थिक एजेंडे पर अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने कहा- 'इमरजेंसी कानून से व्यापक टैरिफ का अधिकार नहीं'
आईएनएस, वॉशिंगटन
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आर्थिक कार्यक्रम को ऐतिहासिक कानूनी चुनौती का सामना करना पड़ा है। यूनाइटेड स्टेट्स सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को बड़ा फैसला सुनाते हुए ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए अधिकांश व्यापक टैरिफ (आयात शुल्क) को रद कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि 1977 के आपातकालीन कानून के तहत राष्ट्रपति के पास भारत सहित वैश्विक व्यापारिक साझेदारों पर एकतरफा भारी शुल्क लगाने की शक्ति नहीं है।
6-3 के बहुमत से आया ऐतिहासिक फैसला
सुप्रीम कोर्ट के रूढ़िवादी नेतृत्व वाली पीठ ने 6-3 के अंतर से यह निर्णय सुनाया। इसे ट्रंप के कार्यकारी अधिकारों (Executive Powers) के उपयोग पर एक दुर्लभ लेकिन महत्वपूर्ण अंकुश माना जा रहा है। चीफ जस्टिस जॉन रॉबर्ट्स ने बहुमत का पक्ष रखते हुए कहा है कि राष्ट्रपति एकतरफा तौर पर असीमित मात्रा, अवधि और दायरे के टैरिफ लगाने की अत्यधिक शक्ति का दावा करते हैं। संविधान और इतिहास के संदर्भ में, ऐसे अधिकारों के लिए कांग्रेस (अमेरिकी संसद) की स्पष्ट अनुमति अनिवार्य है। 1977 का कानून, जिस पर राष्ट्रपति ने भरोसा किया, वह इस आवश्यकता को पूरा करने में सक्षम नहीं है।
क्या था 1977 का वह कानून? (IEEPA)
ट्रंप प्रशासन ने इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) का सहारा लिया था। यह कानून राष्ट्रपति को 'असामान्य और असाधारण' विदेशी खतरों के दौरान व्यापार को विनियमित करने की अनुमति देता है। हालांकि, पिछले 50 वर्षों में इसका उपयोग मुख्य रूप से प्रतिबंध (Sanctions) लगाने के लिए हुआ है, न कि व्यापक टैरिफ थोपने के लिए।
भारत और अन्य देशों पर असर
ट्रंप ने इस कानून का उपयोग चीन, मेक्सिको, कनाडा और भारत जैसे देशों पर टैरिफ लगाने के लिए किया था। विशेष रूप से भारतीय उत्पादों और वैश्विक व्यापार शुल्क लगाने पर आपत्ति की है।
भारतीय उत्पादों पर असर : ट्रंप ने भारतीय उत्पादों पर 18 प्रतिशत तक का टैरिफ लगाया था।
वैश्विक व्यापार : अदालत ने माना कि राष्ट्रपति के पास लगभग सभी साझेदार देशों से आयातित वस्तुओं पर इस तरह शुल्क लगाने का अधिकार नहीं है।
किन टैरिफ पर नहीं पड़ेगा असर
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कुछ विशिष्ट क्षेत्रों पर लगाए गए टैरिफ इस फैसले के दायरे से बाहर हैं। स्टील, एल्युमिनियम और कॉपर जैसे क्षेत्रों पर अलग कानूनी प्रावधानों (जैसे सेक्शन 232) के तहत लगाए गए शुल्क प्रभावी बने रहेंगे।
कंपनियों को रिफंड की उम्मीद
इस फैसले के बाद अब कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सैकड़ों कंपनियां, जिन्होंने पहले ही अरबों डॉलर का टैरिफ चुका दिया है, वे अपना पैसा वापस पाने के लिए कानूनी प्रक्रिया शुरू करेंगी। कॉस्टको (Costco), टोयोटा ग्रुप और रेवलॉन (Revlon) जैसी बड़ी कंपनियों ने पहले ही अपने दावों को सुरक्षित रखने के लिए मामले दर्ज कर रखे हैं।
प्रशासन के पास अब क्या विकल्प
हालांकि यह फैसला ट्रंप प्रशासन के लिए एक बड़ी वैधानिक हार है, लेकिन रास्ते पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं।
कांग्रेस की मंजूरी : राष्ट्रपति संसद (कांग्रेस) से टैरिफ के लिए नया कानून पास करवा सकते हैं।
वैकल्पिक कानून : प्रशासन अन्य मौजूदा व्यापारिक कानूनों के तहत इन शुल्कों को सही ठहराने की कोशिश कर सकता है।
राष्ट्रपति संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर ही काम करें
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने अमेरिका में 'चेक एंड बैलेंस' (शक्तियों के संतुलन) को फिर से स्थापित किया है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि विदेशी व्यापार और अर्थशास्त्र जैसे जटिल मामलों में भी राष्ट्रपति की शक्तियां असीमित नहीं हैं और उन्हें संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर ही काम करना होगा।
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