RSS प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने लखनऊ में हिंदू समाज को संगठित होने, जनसंख्या असंतुलन पर रोक लगाने और घुसपैठियों के विरुद्ध 'डिटेक्ट, डिलीट, डिपोर्ट' की नीति अपनाने का आह्वान किया। पढ़ें विस्तृत रिपोर्ट।
प्रारब्ध न्यूज ब्यूरो, लखनऊ
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने लखनऊ के निराला नगर स्थित सरस्वती शिशु मंदिर में आयोजित 'सामाजिक सद्भाव बैठक' को संबोधित किया। अपने संबोधन में उन्होंने हिंदू समाज की एकता, जनसंख्या की चुनौतियों और सामाजिक समरसता पर खुलकर अपने विचार रखे।
जनसंख्या असंतुलन और अस्तित्व का संकट
डॉ. भागवत ने हिंदुओं की घटती जनसंख्या पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि समाज के अस्तित्व के लिए कम से कम तीन बच्चे होना आवश्यक है।
वैज्ञानिक तर्क : उन्होंने वैज्ञानिकों का हवाला देते हुए बताया कि जिस समाज में औसत प्रजनन दर तीन से कम होती है, वह समाज भविष्य में विलुप्त होने की कगार पर पहुँच जाता है।
कर्तव्य बोध : उन्होंने कहा कि विवाह का उद्देश्य केवल वासना पूर्ति नहीं, बल्कि सृष्टि को आगे बढ़ाना होना चाहिए। नवदंपतियों को इस उत्तरदायित्व के प्रति जागरूक करना जरूरी है।
घुसपैठ और मतांतरण पर प्रहार
देश की आंतरिक सुरक्षा और जनसांख्यिकी पर बात करते हुए सरसंघचालक ने कड़ा रुख अपनाया है। बढ़ती घुसपैठ पर उन्होंने स्पष्ट कहा कि घुसपैठियों को पहचानना (Detect), मतदाता सूची से हटाना (Delete) और उन्हें देश से बाहर (Deport) करना अनिवार्य है। उन्होंने घुसपैठियों को रोजगार न देने की भी अपील की है।
घर वापसी : लालच और जबरदस्ती होने वाले मतांतरण पर रोक लगाने के साथ ही उन्होंने 'घर वापसी' अभियान को तेज करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि वापस आने वालों का हमें पूरा सम्मान और ध्यान रखना होगा।
"हम किसी के विरोधी नहीं हैं और न ही किसी को मिटाना चाहते हैं। हम 'एक सत्य' के दर्शन को मानते हैं, लेकिन हमें सावधान और संगठित रहने की आवश्यकता है।" - डॉ. मोहन भागवत, सरसंघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ।
सामाजिक सद्भाव और भेदभाव का अंत
समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव को डॉ. भागवत ने समय चक्र की एक बुरी आदत बताया।
समन्वय से विकास : उन्होंने कहा कि संघर्ष से नहीं, बल्कि समन्वय से दुनिया आगे बढ़ती है। जातियों को झगड़े का कारण नहीं बनना चाहिए।
समानता का भाव : "जो नीचे गिर गए हैं, उन्हें झुककर ऊपर उठाना होगा।" उन्होंने आह्वान किया कि बस्ती स्तर पर नियमित सद्भाव बैठकें होनी चाहिए ताकि गलतफहमियां दूर हों।
मातृशक्ति : परिवार का आधार और 'असुर मर्दिनी'
महिलाओं की भूमिका पर बोलते हुए डॉ. भागवत ने उन्हें परिवार की धुरी बताया है। उन्होंने कहा कि महिलाओं को 'अबला' समझना गलत है, वे 'असुर मर्दिनी' का रूप हैं। उन्हें आत्म-संरक्षण का प्रशिक्षण मिलना चाहिए।
भारतीय बनाम पाश्चात्य दृष्टि : पश्चिम में स्त्री को पत्नी के रूप में देखा जाता है, जबकि भारत में उन्हें 'माता' का दर्जा प्राप्त है। यहाँ सौंदर्य नहीं, 'वात्सल्य' की प्रधानता है।
विदेशी शक्तियों के प्रति चेतावनी
डॉ. भागवत ने चेताया कि अमेरिका और चीन जैसी विदेशी शक्तियां भारत की आंतरिक सद्भावना को बिगाड़ने की योजना बना रही हैं। उन्होंने भारतीयों से एक-दूसरे के प्रति अविश्वास को समाप्त करने और बाहरी साजिशों के प्रति सतर्क रहने को कहा।
बैठक में विभिन्न पंथों की सहभागिता
इस महत्वपूर्ण बैठक में केवल हिंदू ही नहीं, बल्कि सिख, बौद्ध, जैन समाज सहित रामकृष्ण मिशन, इस्कॉन, जय गुरुदेव, आर्य समाज, और संत रविदास पीठ जैसे विभिन्न धार्मिक व सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया, जो भारत की साझी विरासत को दर्शाता है।
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डॉ. मोहन भागवत के जनसंख्या और सामाजिक एकता पर दिए गए इन सुझावों पर आपकी क्या राय है।
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