नवयुग कन्या महाविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा 'अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस' पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में डॉ. राम बहादुर मिश्र और डॉ. उमाशंकर शुक्ल 'शितिकंठ' जैसे विद्वानों ने भाषाई विविधता और राष्ट्र निर्माण पर अपने विचार साझा किए।
प्रारब्ध न्यूज ब्यूरो, लखनऊ
'अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस' के ऐतिहासिक अवसर पर आज यानी शनिवार को नवयुग कन्या महाविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। 'भाषाई विविधता: राष्ट्रीय एकता का आधार' विषय पर केंद्रित इस संगोष्ठी में देश के जाने-माने विद्वानों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और भाषाओं के अंतर्संबंधों पर गहन विमर्श किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ और सांस्कृतिक चेतना
संगोष्ठी का भव्य शुभारंभ मुख्य अतिथि एवं अन्य गणमान्य अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन और माल्यार्पण के साथ हुआ। 'वन्दे मातरम्' के सामूहिक गान ने पूरे वातावरण को राष्ट्रभक्ति के रंग में सराबोर कर दिया। भारतीय गौरवशाली परंपरा के अनुसार आए हुए सभी अतिथियों का भव्य स्वागत एवं अभिनंदन किया गया।
वक्ताओं के मातृभाषा और भाषाई अस्मिता पर विचार
डॉ. अंकिता पाण्डेय (हिंदी विभाग): अपने स्वागत उद्बोधन में डॉ. पाण्डेय ने मातृभाषा के प्रति निष्ठा और उसके संरक्षण को आज की सबसे बड़ी आवश्यकता बताया।
डॉ. राम बहादुर मिश्र (विशिष्ट वक्ता): उन्होंने जोर देकर कहा कि "विविधता में एकता भारत की आत्मा है और भाषाएँ इसे जोड़ने वाले सूत्र हैं।" उन्होंने सुझाव दिया कि लोक भाषाओं को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए ताकि युवा पीढ़ी अपनी जड़ों और व्याकरण से जुड़ सके। अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव पर चिंता जताते हुए उन्होंने अवधी की वाचिक परंपरा और लोकोक्तियों के महत्व को समझाया।
डॉ. उमाशंकर शुक्ल 'शितिकंठ' (मुख्य वक्ता): प्रख्यात साहित्यकार डॉ. शुक्ल ने कहा कि मातृभाषा सांस्कृतिक अस्मिता की संवाहिका है। उन्होंने साहित्य के विकेंद्रीकरण, डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल के योगदान और राहुल सांकृत्यायन द्वारा हिंदी साहित्य के इतिहास में क्षेत्रीय बोलियों को दिए गए स्थान का उल्लेख किया। उन्होंने तर्क दिया कि क्षेत्रीय मातृभाषाएं हिंदी के विकास में सहायक हैं, बाधक नहीं।शिक्षा और संस्कार में मातृभाषा का महत्व
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहीं महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. मंजुला उपाध्याय ने शिक्षा और संस्कार के क्षेत्र में मातृभाषा की अनिवार्यता पर प्रकाश डाला। उन्होंने छात्राओं को प्रेरित करते हुए कहा कि अपनी जड़ों से जुड़े रहना ही व्यक्तित्व के विकास का सही मार्ग है। प्राचार्या ने सभी अतिथियों का आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया।
उपस्थिति और समापन
इस गरिमामयी अवसर पर हिंदू कन्या महाविद्यालय (सीतापुर) की डॉ. स्नेहलता, महाविद्यालय के समस्त प्राध्यापक गण, शोधार्थी और बड़ी संख्या में छात्राएं उपस्थित रहीं। सभी प्रतिभागियों ने भाषाई सौहार्द बनाए रखने का सामूहिक संकल्प लिया। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के साथ अत्यंत गरिमापूर्ण वातावरण में हुआ।
मुख्य बिंदु
लोक भाषाओं के व्याकरण को पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांग।
साहित्यिक विकेंद्रीकरण और क्षेत्रीय बोलियों का हिंदी में महत्व।
विद्वानों द्वारा 'Hello' जैसे शब्दों के मूल संस्कृत आधार पर रोचक चर्चा।
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