RSS News: Lucknow में डॉ. मोहन भागवत ने कहा- सामाजिक समरसता ही एकता का आधार

लखनऊ में अपने संबोधन में डॉ. मोहन भागवत ने सामाजिक समरसता, हिंदू पहचान और राष्ट्र निर्माण पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने सामाजिक समरसता को एकता का आधार बताया। जानें जातिवाद, मंदिर नियंत्रण, संयुक्त परिवार और ग्लोबल साउथ पर उनके विचार।

डॉ. मोहन भागवत : सामाजिक समरसता और हिंदू पहचान ही राष्ट्र की एकता का मूल आधार

प्रारब्ध न्यूज ब्यूरो, लखनऊ 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने हाल ही में लखनऊ में आयोजित एक प्रमुख जन गोष्ठी में समाज, परिवार और राष्ट्र निर्माण को लेकर महत्वपूर्ण विचार साझा किए। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत की असली शक्ति उसकी सामाजिक समरसता और हिंदू पहचान में निहित है।

डॉ. मोहन भागवत के संबोधन के प्रमुख बिंदु

हिंदू धर्म और पंथ निरपेक्षता : डॉ. भागवत ने कहा कि हिंदू धर्म ही वास्तविक मानव धर्म है। उन्होंने जोर देकर कहा कि दुनिया में अगर कोई वास्तव में पंथ निरपेक्ष (Secular) समाज है, तो वह हिंदू समाज है।

जातिवाद का अंत : "जाति को मिटाने के लिए उसे भुलाना होगा।" सरसंघचालक के अनुसार, संघ में किसी की जाति नहीं पूछी जाती। युवा पीढ़ी के आचरण में अब जातिगत भेदभाव कम हो रहा है, जो एक सकारात्मक संकेत है। जिस दिन समाज जाति-पाति को महत्व देना बंद कर देगा, राजनीति की दिशा भी बदल जाएगी।

संयुक्त परिवार और संस्कार

आधुनिकता के नाम पर पश्चिमीकरण का विरोध करते हुए उन्होंने कहा कि बच्चों को घर पर ही धर्म और संस्कारों की शिक्षा दी जानी चाहिए। "धन का प्रदर्शन हमारी परंपरा नहीं है, बल्कि संस्कारों का संवर्धन हमारी पहचान है।"

मंदिरों का नियंत्रण और समाज निर्माण

डॉ. भागवत ने मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने की वकालत की। उन्होंने कहा कि मंदिरों का संचालन भक्तों, धर्माचार्यों और सज्जन शक्ति के हाथों में होना चाहिए। मंदिरों से प्राप्त धन का उपयोग राष्ट्रहित और हिंदू कल्याण के लिए किया जाना चाहिए। इस दिशा में निरंतर विश्व हिंदू परिषद (VHP) प्रयास कर रही है।

ग्राम विकास और आत्मनिर्भर भारत

संघ केवल व्यक्ति निर्माण ही नहीं, बल्कि ग्राम विकास पर भी केंद्रित है। संघ ने देश के 5,000 गांवों को विकास के लिए गोद लिया है, जिनमें से 333 गांव पूर्णतः आदर्श बन चुके हैं। इन गांवों में शिक्षा, स्वरोजगार और विवाद-मुक्त (मुकदमा विहीन) समाज की स्थापना की गई है।

वैश्विक अर्थव्यवस्था : डॉ. भागवत ने विश्वास जताया कि भारत 'ग्लोबल साउथ' का नेतृत्व करेगा। उन्होंने कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था बैंकों या पूंजीपतियों के बजाय भारतीय घरों की बचत और सामर्थ्य पर टिकी है।

सज्जन शक्ति से आह्वान

अंत में, उन्होंने समाज के प्रबुद्ध वर्ग से आह्वान किया कि वे देश के परिवर्तन के लिए किसी न किसी सामाजिक प्रकल्प से जुड़ें। उन्होंने सुझाव दिया कि संघ को समझने के लिए या तो उसकी शाखा में आएं या उसके सामाजिक कार्यों में भागीदारी करें।

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