Republic day:अतीत की गूँज और भविष्य का विज़न: भारत का 77वाँ गणतंत्र दिवस


प्रारब्ध न्यूज़ ब्यूरो, नई दिल्ली 

जैसे ही 26 जनवरी, 2026 की सुनहरी सुबह कर्तव्य पथ पर दस्तक दी, हवा में देशभक्ति के साथ-साथ एक विशेष उत्साह घुला हुआ है। इस साल भारत न केवल अपने संविधान की 76वीं वर्षगांठ मना रहा है, बल्कि हम अपनी सांस्कृतिक यात्रा के एक ऐतिहासिक पड़ाव "वंदे मातरम" के 150 वर्ष का भी जश्न मना रहे हैं।


​नई दिल्ली की भव्य परेड से लेकर देश के महानगरों, राज्य की राजधानी, शहरों व छोटे-छोटे कस्बों में होने वाले ध्वजारोहण तक, गणतंत्र दिवस 2026 इस बात का प्रमाण है कि एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में हमने कितनी लंबी और गौरवशाली दूरी तय की है।


​एक गीत जिसने राष्ट्र को गढ़ा


​वर्ष 2026 का मुख्य विषय, "वंदे मातरम के 150 वर्ष", हमें हमारे स्वतंत्रता संग्राम की जड़ों की ओर ले जाता है। बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचित यह राष्ट्रीय गीत एक सदी से भी अधिक समय से भारतीय देशभक्ति की धड़कन रहा है। इस साल की परेड में वर्ष 1923 के प्रसिद्ध 'वंदे मातरम ' से प्रेरित झांकियां प्रदर्शित की जा रही हैं, जो पारंपरिक कला और आधुनिक तकनीक के मेल से यह दिखाएंगी कि कैसे एक गीत ने पूरे उपमहाद्वीप को एकजुट कर दिया था।


​वैश्विक संबंधों की मजबूती


​वर्ष 2026 का यह समारोह वैश्विक मंच पर भारत के बढ़ते प्रभाव को भी रेखांकित करता है। एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक कदम के तहत, इस बार हमारे पास दो मुख्य अतिथि हैं। यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन।


​राष्ट्रपति कोस्टा की भारत यात्रा विशेष रूप से भावनात्मक है क्योंकि उनके पूर्वज गोवा से थे। यह हमें याद दिलाता है कि भारतीय प्रवासी आज पूर्व और पश्चिम के बीच एक जीवंत सेतु का काम कर रहे हैं। यह साझेदारी इस साल के उप-विषय "विकसित भारत" और "भारत: लोकतंत्र की जननी" को और भी सशक्त बनाती है।


​परेड से परे, संविधान की भावना


आसमान में गरजते विमान और टैंकों का प्रदर्शन विस्मयकारी होता है, लेकिन गणतंत्र दिवस मूल रूप से हमारे संविधान का उत्सव है। यही वह दिन था जब हम एक ब्रिटिश उपनिवेश से हटकर एक ऐसे गणराज्य बने जहां शक्ति जनता के हाथों में निहित है। यह डॉ. बीआर आंबेडकर और संविधान सभा के उन महापुरुषों को याद करने का दिन है, जिन्होंने एक ऐसे भारत की कल्पना की थी जहां हर नागरिक, चाहे उसकी पृष्ठभूमि कुछ भी हो, देश के भविष्य में बराबर का भागीदार हो।


​आज का उत्सव, एक नई पहल


​वर्ष 2026 में उत्सव का तरीका केवल देखने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सक्रिय भागीदारी बढ़ गई है।


​पर्यावरण के प्रति जागरूकता शहरों में "ग्रीन रिपब्लिक" पहल अपनाई जा रही है, जहां सिंथेटिक रंगों के बजाय फूलों की रंगोली और बीज-युक्त कागज (seed paper) के झंडों का उपयोग किया जा रहा है।

  • ​डिजिटल गणतंत्र : स्कूल और कॉलेज वर्चुअल रियलिटी (VR) के माध्यम से संसद भवन का दौरा करा रहे हैं, जिससे छात्र उस ऐतिहासिक कक्ष को करीब से देख सकें जहां संविधान पर हस्ताक्षर हुए थे।
  • ​तिरंगा थाली : केसरिया पुलाव, सफेद इडली और हरी चटनी के माध्यम से भोजन की मेज पर भी एकता का स्वाद चखा जा रहा है।

भविष्य की ओर


​जब हम आसमान में लहराते तिरंगे को देखते हैं, तो हमें याद आता है कि एक 'गणराज्य' होना, एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। इसके लिए हमारी सक्रिय भागीदारी, कानून के प्रति सम्मान और स्वतंत्रता व बंधुत्व के मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता आवश्यक है।वंदे मातरम  केवल अतीत के शब्द नहीं हैं, बल्कि आने वाले 150 वर्षों के समृद्ध और समावेशी भारत के निर्माण का आह्वान हैं।


​आप सभी को 77वें गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

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