दिनांक : 04 जनवरी 2026
दिन : रविवार
विक्रम संवत् : 2082
अयन : दक्षिणायण
ऋतु : शिशिर
मास : माघ
पक्ष : कृष्ण
तिथि : प्रतिपदा दोपहर 12:29 बजे तक तत्पश्चात द्वितीया
नक्षत्र : पुनर्वसु दोपहर 03:11 बजे तक तत्पश्चात पुष्य
योग : वैधृति रात्रि 01:47 बजे तक
करण : कौलव दोपहर 12:29 बजे तक तत्पश्चात तैतिल
राहुकाल : शाम 04:11 बजे से शाम 05:30 बजे तक
सूर्योदय : प्रातः 06:56 बजे
सूर्यास्त : संध्या 05:26 बजे
दिशा शूल : पश्चिम दिशा में
ब्रह्ममुहूर्त : प्रातः 05:09 बजे से प्रातः 06:03 बजे तक
अभिजीत मुहूर्त : सुबह 11:52 बजे से दोपहर 12:34 बजे तक
निशिता मुहूर्त : रात्रि 11:46 बजे से रात्रि 12:40 बजे तक
सूर्य राशि : धनु
चंद्रमा राशि : मिथुन मे सुबह 09:43 बजे तक
बृहस्पति राशि : मिथुन
व्रत पर्व विवरण : माघ प्रारम्भ, इष्टि, रवि पुष्य योग, त्रिपुष्कर योग, सर्वार्थ सिद्धि योग।
शिववास : गौरी के साथ दोपहर 12:29 बजे तक
अग्निवास : पाताल में दोपहर 12:29 बजे तक
रविपुष्य योग : दोपहर 03:11 बजे से 05 जनवरी प्रातः 06:56 बजे तक
सर्वार्थ सिद्धि योग : दोपहर 03:11 बजे से 05 जनवरी प्रातः 06:56 बजे तक
सौजन्य
आचार्य आदित्य वशिष्ठ
मोबाइल नंबर: 7309053333
पुष्य नक्षत्र योग
04 जनवरी रविवार दोपहर 03:11 बजे से 05 जनवरी सूर्योदय तक रविपुष्यामृत योग है।
इस योग में 108 मोती की माला लेकर जो गुरुमंत्र का जप करता है, श्रद्धापूर्वक तो 27 नक्षत्र के देवता उस पर खुश होते हैं और नक्षत्रों में मुख्य है पुष्य नक्षत्र, और पुष्य नक्षत्र के स्वामी हैं देवगुरु ब्रहस्पति। पुष्य नक्षत्र समृद्धि देनेवाला है, सम्पति बढ़ाने वाला है। उस दिन ब्रहस्पति का पूजन करना चाहिए। पूजन करें और मन ही मन ये मंत्र बोलें:-
ॐ ऐं क्लीं ब्रहस्पतये नम :। ॐ ऐं क्लीं ब्रहस्पतये नम :।
ऐसे दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलें : बरगद के पत्ते पर गुरुपुष्य या रविपुष्य योग में हल्दी से स्वस्तिक बनाकर घर में रखें।
रविपुष्यामृत योग
‘शिव पुराण’ में पुष्य नक्षत्र को भगवान शिव की विभूति बताया गया है। पुष्य नक्षत्र के प्रभाव से अनिष्ट-से-अनिष्टकर दोष भी समाप्त और निष्फल-से हो जाते हैं, वे हमारे लिए पुष्य नक्षत्र के पूरक बनकर अनुकूल फलदायी हो जाते हैं। सर्वसिद्धिकर: पुष्य:। इस शास्त्रवचन के अनुसार पुष्य नक्षत्र सर्वसिद्धिकर है। पुष्य नक्षत्र में किए गए श्राद्ध से पितरों को अक्षय तृप्ति होती है तथा कर्ता को धन, पुत्रादि की प्राप्ति होती है।
इस योग में किया गया जप, ध्यान, दान, पुण्य महाफलदायी होता है परंतु पुष्य में विवाह व उससे संबधित सभी मांगलिक कार्य वर्जित हैं। (शिव पुराण, विद्येश्वर संहिताः अध्याय 10)।
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