Darbhanga Maharani Special Report : महारानी कामासुंदरी देवी; महलों से परे, समाज और साहित्य की संरक्षिका

प्रारब्ध न्यूज ब्यूरो, दरभंगा 

जब 1962 में महाराजा कामेश्वर सिंह का निधन हुआ, तो दरभंगा रियासत के सामने विरासत को सहेजने की बड़ी चुनौती थी। ऐसे समय में महारानी कामासुंदरी देवी ने न केवल खुद को संभाला, बल्कि 'कल्याणी फाउंडेशन' के माध्यम से महाराजा के विजन को जिंदा रखा।

दरभंगा महाराजा कामेश्वर सिंह ने तीन शादियां कीं, लेकिन किसी से कोई संतान नहीं हुई। निःसंतान ही रहे। ऐसे में उनके निधन के बाद महारानी कामासुंदरी देवी पर विरासत को संभालने की जिम्मेदारी आ गई। खुद को संभालने के साथ ही 'महाराजा के विजन को कल्याणी फाउंडेशन' के माध्यम से जिंदा रखा।

विरासत को सहेजने के 3 मुख्य स्तंभ

दुर्लभ ग्रंथों का खजाना

महारानी द्वारा स्थापित लाइब्रेरी में मौजूद 15,000 पुस्तकें केवल कागज का ढेर नहीं हैं। इनमें संस्कृत, मैथिली और अंग्रेजी की ऐसी पांडुलिपियाँ शामिल हैं, जो दुनिया में कहीं और उपलब्ध नहीं हैं। शोधकर्ताओं के लिए यह पुस्तकालय आज भी ज्ञान का मंदिर है।

मिथिला पेंटिंग और कला को संरक्षण

महारानी ने स्थानीय कलाकारों को हमेशा प्रोत्साहित किया। दरभंगा हाउस और कल्याणी निवास में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने कई कलाकारों को अंतरराष्ट्रीय मंच दिलाने में मदद की।

सादगी भरा जीवन

दरभंगा राज की महारानी होने के बावजूद, उनका जीवन सादगी की मिसाल था। वे अक्सर स्थानीय मैथिली कार्यक्रमों में शिरकत करती थीं और लोगों से सीधा संवाद रखती थीं।

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