Assam Election 2026: असम बीजेपी में बड़ी बगावत, कई विधायकों और दिग्गज नेताओं ने छोड़ी पार्टी

Assam BJP Rebellion 2026 असम विधानसभा चुनाव 2026 से पहले बीजेपी में हड़कंप। टिकट न मिलने से नाराज विधायक निहार रंजन दास, अमिया कुमार भूयान और वरिष्ठ नेताओं ने दिया इस्तीफा। जानें कांग्रेस और भाजपा की स्थिति।

प्रारब्ध न्यूज ब्यूरो, गुवाहाटी 

BJP Leaders Resign Assam असम विधानसभा चुनाव 2026 के लिए मतदान की तारीख (9 अप्रैल) जैसे-जैसे करीब आ रही है, सत्ताधारी दल भाजपा के अंदर असंतोष की आग तेज हो गई है। पार्टी द्वारा उम्मीदवारों की पहली सूची जारी किए जाने के बाद से ही राज्य के विभिन्न हिस्सों से इस्तीफों की झड़ी लग गई है। कई मौजूदा विधायकों और दशकों से पार्टी की सेवा कर रहे वरिष्ठ नेताओं ने 'पैराशूट उम्मीदवारों' को प्राथमिकता देने का आरोप लगाते हुए पार्टी को अलविदा कह दिया है। Assam Election 2026.

इन बड़े चेहरों ने छोड़ा भाजपा का साथ

बगावत की लहर बराक घाटी से लेकर मध्य असम तक फैली हुई है। इस्तीफा देने वाले प्रमुख नाम इस प्रकार हैं।

निहार रंजन दास (विधायक, ढोलई) : टिकट कटने से सबसे बड़ा झटका ढोलई निर्वाचन क्षेत्र में लगा है। मौजूदा विधायक निहार रंजन दास ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है और अब वे निर्दलीय चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं।

अमिया कुमार भूयान (विधायक, बिहपुरिया) : लखीमपुर जिले की बिहपुरिया सीट से मौजूदा विधायक अमिया कुमार भूयान ने भी टिकट न मिलने पर नाराजगी जताते हुए पार्टी छोड़ दी है।

जयंता कुमार दास (वरिष्ठ नेता, दिसपुर) : दिसपुर सीट से टिकट के प्रबल दावेदार और 35 साल पुराने कार्यकर्ता जयंता कुमार दास ने इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी ने निष्ठावान कार्यकर्ताओं की अनदेखी की है। वे अब निर्दलीय मैदान में उतर सकते हैं।

चक्रधर दास (वरिष्ठ नेता, बोंगाईगांव) : बोंगाईगांव से टिकट न मिलने पर चक्रधर दास ने बगावती तेवर अपनाते हुए निर्दलीय चुनाव लड़ने का ऐलान किया है।

संजय रे (उपाध्यक्ष, युवा मोर्चा) : अभयपुरी सीट से दावेदारी कर रहे युवा चेहरा संजय रे ने टिकट न मिलने पर भावुक होकर पार्टी से इस्तीफा दे दिया।

अमर चंद्र जैन (पूर्व विधायक, कटिगौड़) : कटिगौड़ के पूर्व विधायक अमर चंद्र जैन ने बीजेपी का साथ छोड़ कांग्रेस का हाथ थाम लिया है, जिससे बराक घाटी में समीकरण बदल गए हैं।

बीजेपी बनाम कांग्रेस: मौजूदा स्थिति

भाजपा (BJP) की चुनौती

मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में भाजपा ने इस बार कई मौजूदा विधायकों के टिकट काटकर नए चेहरों और अन्य दलों से आए नेताओं (जैसे पूर्व कांग्रेस सांसद प्रद्युत बोरदोलोई) पर दांव लगाया है। पार्टी का मानना है कि 'एंटी-इंकंबेंसी' को कम करने के लिए यह जरूरी है, लेकिन जमीनी कार्यकर्ताओं में इसे लेकर भारी आक्रोश है। अगर यह बगावत निर्दलीय उम्मीदवारों के रूप में वोटों का ध्रुवीकरण करती है, तो बीजेपी को भारी नुकसान हो सकता है।

कांग्रेस (Congress) की स्थिति

कांग्रेस इस बार 'असम संमिलित मोर्चा' (8 दलों का गठबंधन) के साथ मजबूती से चुनाव लड़ रही है। बीजेपी में मची इस भगदड़ का सीधा फायदा कांग्रेस को मिलता दिख रहा है। खासकर बराक घाटी और ऊपरी असम में बीजेपी के बागी नेता या तो कांग्रेस में शामिल हो रहे हैं या निर्दलीय लड़कर बीजेपी के वोट बैंक में सेंध लगा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कांग्रेस ने इन बागियों और असंतुष्टों को सही ढंग से मैनेज किया, तो सत्ता की राह उसके लिए आसान हो सकती है।

असम में निष्ठा' बनाम 'रणनीति' की जंग

असम की राजनीति में इस समय 'निष्ठा' बनाम 'रणनीति' की जंग चल रही है। जहां भाजपा अपने 'मिशन 100+' को लेकर आश्वस्त है, वहीं उसके अपने ही सेनापति अब उसके खिलाफ खड़े हैं। 9 अप्रैल को होने वाले मतदान में यह देखना दिलचस्प होगा कि जनता 'कमल' पर भरोसा बरकरार रखती है या बागियों की लहर 'हाथ' को मजबूती देती है।

"असम भाजपा भवन पर अब कांग्रेस छोड़ने वाले लोगों का दबदबा है और इसका नेतृत्व हिमंत बिस्वा सरमा कर रहे हैं। पुराने कट्टर भाजपाई अब वहां नहीं हैं।" - गौरव गोगोई, प्रदेश अध्यक्ष, असम राज्य कांग्रेस कमेटी।

भाजपा को बड़े झटकों का करना पड़ रहा सामना

असम विधानसभा चुनाव 2026 की सरगर्मियों के बीच सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) को बड़े झटकों का सामना करना पड़ रहा है। टिकट वितरण से नाराज कई दिग्गज नेताओं और मौजूदा विधायकों ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है, जिससे राज्य के राजनीतिक समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं।

बागी सीटों का तुलनात्मक विश्लेषण (Impact Analysis)


ढोलई (Dholai) विधानसभा क्षेत्र के बागी/प्रभावशाली नेता निहार रंजन दास, जो मौजूदा विधायक हैं का टिकट काटकर नए चेहरे को देना कार्यकर्ताओं में रोष पैदा कर गया है। कांग्रेस यहाँ अपने पुराने कैडर को एकजुट कर रही है, जिसे भाजपा के बिखराव का सीधा लाभ मिलेगा। यहां मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है, क्योंकि निहार रंजन दास निर्दलीय लड़कर भाजपा का कोर वोट बैंक काटेंगे।

बिहपुरिया (Bihpuria) विधानसभा क्षेत्र के बागी/प्रभावशाली नेता अमिया कुमार भूयान (विधायक) भूयान का जमीनी जुड़ाव मजबूत है। उनके जाने से भाजपा का संगठनात्मक ढांचा यहाँ कमजोर हुआ है। कांग्रेस (AGP/गठबंधन के साथ) यहाँ एंटी-इंकंबेंसी और बागी सुरों का फायदा उठाने की कोशिश में है। झुकाव कांग्रेस की ओर: भाजपा के वोट दो हिस्सों में बंटने की प्रबल संभावना।

कटिगौड़ (Katigora) विधानसभा क्षेत्र के बागी/प्रभावशाली नेता अमर चंद्र जैन, जो पूर्व विधायक का कांग्रेस में जाना भाजपा के लिए 'बराक वैली' में बड़ा सेटबैक है। अमर चंद्र जैन के आने से कांग्रेस का पलड़ा यहाँ भारी हो गया है, क्योंकि उनके पास अपना व्यक्तिगत वोट बैंक है। कांग्रेस मजबूत: यहाँ भाजपा को अपनी रणनीति पूरी तरह बदलनी होगी।

दिसपुर (Dispur) विधानसभा क्षेत्र के बागी/प्रभावशाली नेता जयंता कुमार दास (वरिष्ठ नेता) 35 साल के पुराने कार्यकर्ता का जाना 'निष्ठावान बनाम बाहरी' की बहस को जन्म दे चुका है। राजधानी की इस सीट पर शहरी मध्यम वर्ग भाजपा से जुड़ा रहा है, लेकिन बगावत ने संशय पैदा कर दिया है। कड़ा मुकाबला: जयंता दास अगर निर्दलीय डटे रहे, तो भाजपा की जीत का अंतर काफी कम हो सकता है।

बगावत का समग्र प्रभाव: विश्लेषण

वोटों का ध्रुवीकरण (Vote Splitting) : भाजपा का मुख्य डर यह है कि बागी नेता (निहार रंजन और चक्रधर दास जैसे) 'हिंदू वोटों' में सेंध लगाएंगे। अगर यह वोट 10-15% भी कटते हैं, तो कांग्रेस गठबंधन आसानी से सीट निकाल लेगा।

संगठनात्मक कमजोरी : बिहपुरिया और ढोलई जैसी सीटों पर विधायक के साथ ब्लॉक और मंडल स्तर के अध्यक्षों ने भी इस्तीफे दिए हैं। चुनाव के दिन 'बूथ मैनेजमेंट' के लिए भाजपा को नए सिरे से मशक्कत करनी होगी।

कांग्रेस की रणनीति : कांग्रेस ने इस बार बहुत ही शांति से भाजपा के असंतुष्टों के लिए अपने दरवाजे खुले रखे हैं। पार्टी 'असमिया अस्मिता' और 'स्थानीय नेतृत्व' के मुद्दे को हवा दे रही है, जिससे भाजपा के बागी नेता मेल खाते हैं।

बागी न माने तो कांग्रेस गठबंधन को होगा फायदा 

यदि भाजपा अगले 48 घंटों में इन बागियों को मनाने या डैमेज कंट्रोल करने में विफल रहती है, तो असम संमिलित मोर्चा (कांग्रेस गठबंधन) को उन 15-20 सीटों पर सीधा फायदा मिल सकता है जहाँ जीत का अंतर पिछले चुनाव में 5,000 से कम था।

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