जानें दिल्ली के पहले हवाई अड्डे, सफदरजंग एयरपोर्ट (विलिंगडन एयरफील्ड) की अनकही कहानी। 1929 से लेकर आज तक, गुलामी से आज़ादी और सन्नाटे तक का पूरा सफर।
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| दिल्ली का सफ़दरजंग एयरपोर्ट वर्ष 1948 में कुछ इस तरह दिखता था। तस्वीर में सफ़दरजंग का मक़बरा भी स्पष्ट दिखाई पड़ रहा है। साथ ही एयरपोर्ट पर टाटा एयरलाइंस का हवाई जहाज़ भी खड़ा दिखाई पड़ रहा है। |
प्रारब्ध न्यूज ब्यूरो, नई दिल्ली
दिल्ली के दिल में स्थित सफदरजंग एयरपोर्ट के पास से गुजरते हुए शायद ही कोई आज कल्पना कर पाए कि यह शांत दिखने वाला मैदान कभी हवाई जहाजों की गड़गड़ाहट से गूंजता था। साल 1948 की ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरों में जब हम एक तरफ ऐतिहासिक सफदरजंग का मक़बरा और दूसरी तरफ टाटा एयरलाइंस के विमानों को एक ही फ्रेम में देखते हैं, तो वक्त मानो ठहर सा जाता है।
आइए जानते हैं, दिल्ली के इस पहले एयरपोर्ट के 'विलिंगडन एयरफील्ड' से एक 'शांत वीवीआईपी बेस' बनने तक की पूरी कहानी।
विलिंगडन एयरफील्ड, दिल्ली का पहला टेक-ऑफ (1929)
ब्रिटिश काल के दौरान साल 1929 में इस एयरफील्ड की नींव रखी गई थी। तब इसे विलिंगडन एयरफील्ड के नाम से जाना जाता था। यह न केवल दिल्ली का पहला हवाई अड्डा था, बल्कि पूरे भारत के शुरुआती विमानन केंद्रों में से एक था। उस दौर में हवाई सफर एक विलासिता और कौतूहल का विषय हुआ करता था।
जब इतिहास और भविष्य मिले एक ही फ्रेम में
सफदरजंग एयरपोर्ट की सबसे खास बात इसकी लोकेशन थी। मुग़ल वास्तुकला के बेजोड़ नमूने 'सफदरजंग के मक़बरे' के ठीक बगल में स्थित होने के कारण यहाँ का नज़ारा अद्भुत होता था।
तथ्य : वर्ष 1948 की तस्वीरों में आज भी देखा जा सकता है कि कैसे एक तरफ प्राचीन गुंबद खड़े थे। वहीं, दूसरी तरफ आधुनिक प्रोपेलर विमान रनवे पर दौड़ रहे थे।
टाटा एयरलाइंस और एयर इंडिया का उदय
आजादी से पहले और उसके कुछ समय बाद तक यहाँ टाटा एयरलाइंस का दबदबा था। यही वह कंपनी थी जो आगे चलकर भारत की राष्ट्रीय विमानन सेवा 'एयर इंडिया' बनी। छोटे विमान, कम यात्री और उड़ने का वह शुरुआती रोमांच इसी मिट्टी से शुरू हुआ था।
आजादी के बाद का बदलाव, नया नाम और नई पहचान
वर्ष 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद, गुलामी के प्रतीक 'विलिंगडन' नाम को हटा दिया गया। पास में स्थित मक़बरे के सम्मान में इसका नाम बदलकर सफदरजंग एयरपोर्ट कर दिया गया। वर्ष 1960 के दशक की शुरुआत तक, यह दिल्ली का मुख्य नागरिक हवाई अड्डा बना रहा।
सफदरजंग से पालम (IGI) तक का सफर
जैसे-जैसे तकनीक बदली, विमानों का आकार बड़ा होने लगा। जेट विमानों के आगमन के साथ सफदरजंग एयरपोर्ट की सीमाएं छोटी पड़ने लगीं।
छोटा रनवे : यहाँ का रनवे बड़े जेट विमानों के लिए पर्याप्त नहीं था।
शहरी आबादी : एयरपोर्ट के चारों ओर दिल्ली की घनी आबादी बस चुकी थी, जिससे सुरक्षा और शोर की समस्या बढ़ने लगी।
शिफ्टिंग : वर्ष 1960 के दशक में नागरिक उड़ानों को पालम एयरपोर्ट (जिसे आज हम इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा कहते हैं) पर शिफ्ट कर दिया गया।
वर्तमान स्थिति, एक 'ज़िंदा इतिहास'
वर्ष 2001-2002 के बाद सुरक्षा कारणों से यहाँ से सभी सार्वजनिक और वाणिज्यिक उड़ानों को पूरी तरह बंद कर दिया गया।
आज यहाँ क्या होता है?
यह एयरपोर्ट अब पूरी तरह बंद नहीं है, बल्कि सीमित उपयोग में है। यहाँ से अब प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और अन्य VVIP हेलीकॉप्टरों का संचालन होता है। इसके अलावा, यह एयरपोर्ट सरकारी विमानन गतिविधियों और विशेष उड़ानों के लिए एक सुरक्षित बेस के रूप में काम करता है।
भारत की विमानन यात्रा का गवाह सफदरजंग एयरपोर्ट
सफदरजंग एयरपोर्ट सिर्फ ज़मीन का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि भारत की विमानन यात्रा का गवाह है। यह वह जगह है जिसने दिल्ली को पहली बार बादलों से बात करना सिखाया। आज भले ही यहां सन्नाटा हो, लेकिन इसकी दीवारें आज भी टाटा के उन शुरुआती विमानों और आज़ाद भारत की पहली उड़ानों की कहानियां सुनाती हैं।

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