Mohsina Kidwai Biography & Political Career वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री मोहसिना किदवई का 94 वर्ष की आयु में निधन। जानिए उनके ऐतिहासिक राजनैतिक सफर, आजमगढ़ उपचुनाव की जीत और उस दौर की अनसुनी कहानियाँ।
मोहसिना किदवई का निधन : आजमगढ़ की वो जीत जिसने इंदिरा गांधी की राजनीति को पुनर्जीवित किया
प्रारब्ध न्यूज ब्यूरो, लखनऊ/नई दिल्ली
भारतीय राजनीति की वयोवृद्ध नेत्री, पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस का सशक्त स्तंभ रहीं श्रीमती मोहसिना किदवई का 94 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। उनके जाने से न केवल कांग्रेस पार्टी बल्कि देश की राजनीति ने एक ऐसी शख्सियत को खो दिया है, जो ईमानदारी, सादगी और संगठन के प्रति अटूट निष्ठा की मिसाल थीं।
आजमगढ़ का वो ऐतिहासिक चुनाव: जब 'पर्दे' के पीछे से रचा गया इतिहास
1977 का दौर इंदिरा गांधी के लिए सबसे कठिन समय था। जनता पार्टी की लहर थी और बड़े-बड़े दिग्गज पीछे हट रहे थे। जब इंदिरा जी ने आजमगढ़ उपचुनाव के लिए कमलापति त्रिपाठी से चुनाव लड़ने को कहा, तो उन्होंने मना कर दिया। उस कठिन समय में मोहसिना किदवई ने अपनी नेता की आवाज पर बिना किसी हिचकिचाहट के आजमगढ़ की राह पकड़ी।
वह दौर संघर्षों का था। विपक्ष ने उनके लिए सर्किट हाउस तक के दरवाजे बंद करवा दिए थे। लेकिन मोहसिना जी डिगी नहीं। गांव-गांव की धूल छानी, इंदिरा गांधी के साथ गली-मोहल्लों में घूमीं। उस दौर की सादगी ऐसी थी कि खुले में कपड़े के पर्दे लगाकर अस्थाई बाथरूम बनाए जाते थे और खुद इंदिरा जी बाल्टी भरकर पानी लाती थीं। उस पसीने और मेहनत ने इतिहास रचा और मोहसिना जी की जीत ने हताश कांग्रेस में नई जान फूंक दी।
एकमात्र मंत्री जिनके पास थे तीन बड़े मंत्रालय
मोहसिना किदवई के नाम एक ऐसा रिकॉर्ड दर्ज है जो न उनसे पहले किसी के पास था और न बाद में। वह देश की एकमात्र ऐसी मंत्री रहीं जिनके पास रेल, सड़क और नागरिक उड्डयन (हवाई मंत्रालय) जैसे तीन महत्वपूर्ण विभाग एक साथ थे। बाद में इन विभागों को अलग-अलग मंत्रालयों में विभाजित कर दिया गया।
जब राज्यसभा सदस्यता खत्म हुई तो घर नहीं था
राजनीति में आज के चकाचौंध भरे दौर में मोहसिना जी की ईमानदारी विस्मित करने वाली है। दशकों तक सत्ता के केंद्र में रहने और महत्वपूर्ण मंत्रालय संभालने के बावजूद, जब उनका राज्यसभा कार्यकाल समाप्त हुआ, तो दिल्ली में उनके पास अपना घर तक नहीं था। स्वर्गीय अहमद पटेल ने उन्हें अपने पास जगह दी थी। यह उनकी उस निष्ठा का प्रमाण है जो उन्होंने गांधी परिवार के साथ रहकर सीखी थी।
उपराष्ट्रपति पद को विनम्रता से ठुकराया
बहुत कम लोग जानते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी उन्हें देश का उपराष्ट्रपति बनाना चाहते थे, लेकिन मोहसिना जी ने विनम्रतापूर्वक इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। उनकी जगह बाद में डॉ. शंकर दयाल शर्मा उपराष्ट्रपति बने, जो आगे चलकर राष्ट्रपति के पद तक पहुँचे।
मुख्य उपलब्धियां और राजनैतिक सफर
यूपी के दो छोरों का प्रतिनिधित्व : वह देश की इकलौती ऐसी सांसद रहीं जिन्होंने उत्तर प्रदेश के दो विपरीत ध्रुवों :- पूर्वांचल (आजमगढ़) और पश्चिम (मेरठ), दोनों का लोकसभा में सफल प्रतिनिधित्व किया।
संगठनात्मक क्षमता : वह ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी (AICC) में कई महत्वपूर्ण पदों पर रहीं और महिला सशक्तीकरण की बुलंद आवाज बनीं।
अंतरराष्ट्रीय जुड़ाव : वह उन चुनिंदा नेताओं में थीं जो 'सीमांत गांधी' खान अब्दुल गफ्फार खान के जनाजे में शामिल होने के लिए सीमा पार गई थीं।
मोहसिना किदवई का जाना, एक युग का रुखसत होना
मोहसिना किदवई का जाना एक युग का रुखसत होना है। उन्होंने राजनीति को सत्ता का जरिया नहीं, बल्कि जनसेवा का माध्यम माना। उनकी जीवटता और दूरंदेशी फैसले हमेशा याद किए जाएंगे।
"ईश्वर उनकी दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करे और शोक संतप्त परिवार को यह अपार दुख सहने की शक्ति दे।"

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