Harish Rana Euthanasia Case भारत में पैसिव यूथेनेशिया (इच्छामृत्यु) का पहला बड़ा मामला। सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बाद 31 वर्षीय हरीश राणा का निधन। जानें क्या है पूरा मामला और पैसिव यूथेनेशिया का कानून।
प्रारब्ध न्यूज ब्यूरो, गाजियाबाद/दिल्ली
भारत के कानूनी इतिहास में इच्छामृत्यु (Euthanasia) से जुड़ा एक अत्यंत भावुक और ऐतिहासिक अध्याय मंगलवार को हरीश राणा के निधन के साथ समाप्त हो गया। 31 वर्षीय हरीश राणा, जो पिछले 13 वर्षों से 'परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट' (कोमा) में थे, ने दिल्ली के एम्स (AIIMS) अस्पताल में अंतिम सांस ली।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश
हरीश राणा के परिवार की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें 'पैसिव यूथेनेशिया' (Passive Euthanasia) की अनुमति प्रदान की थी। अदालत के इस फैसले को देश में इच्छामृत्यु के मामलों में सबसे बड़ा और पहला प्रमाणित उदाहरण माना जा रहा है, जहाँ कोर्ट के हस्तक्षेप से जीवन रक्षक प्रणाली हटाई गई।
क्या थी पूरी प्रक्रिया
अदालती आदेश के पालन में हरीश को दिल्ली एम्स में भर्ती कराया गया था।
16 मार्च : विशेषज्ञों की देखरेख में उनकी फीडिंग ट्यूब (भोजन नली) हटा दी गई।
25 मार्च (मंगलवार) : लगभग 9 दिनों तक बिना कृत्रिम सहायता के रहने के बाद हरीश का प्राकृतिक रूप से निधन हो गया।
क्या है पैसिव यूथेनेशिया
कानून के अनुसार, पैसिव यूथेनेशिया के तहत मरीज को स्वेच्छा से मरने की अनुमति नहीं दी जाती, बल्कि उसे जीवित रखने वाली बाहरी चिकित्सा सहायता (जैसे लाइफ सपोर्ट या फीडिंग ट्यूब) को हटा लिया जाता है, ताकि प्रकृति अपना काम कर सके और मरीज की मृत्यु स्वाभाविक रूप से हो जाए।
13 साल का लंबा संघर्ष
गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा एक दुर्घटना के बाद से बिस्तर पर थे। उनके शरीर में कोई हलचल नहीं थी और वे पूरी तरह से दूसरों पर निर्भर थे। उनके माता-पिता ने लंबी आर्थिक और मानसिक पीड़ा झेलने के बाद गरिमापूर्ण मृत्यु (Right to Die with Dignity) के लिए शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था।
कानूनी और नैतिक बहस
हरीश राणा के इस मामले ने देश में एक बार फिर इच्छा मृत्यु को लेकर कानूनी और नैतिक बहस को जन्म दे दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला भविष्य में इसी तरह के अन्य गंभीर मामलों के लिए एक नजीर (Precedent) साबित होगा।

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