लखनऊ के श्रीखाटू श्याम मंदिर में राष्ट्रीय हिन्दू रक्षा परिषद द्वारा सामाजिक समरसता गोष्ठी और सहभोज का आयोजन। जानिए कैसे सनातन एकता के माध्यम से जातीय भेदभाव मिटाने का संकल्प लिया गया।
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ, जो अपनी तहजीब और संस्कृति के लिए विश्वविख्यात है, हाल ही में एक ऐतिहासिक सामाजिक क्रांति की साक्षी बनी। गोमती के पावन तट पर स्थित श्रीखाटू श्याम मंदिर परिसर में राष्ट्रीय हिन्दू रक्षा परिषद द्वारा आयोजित 'सामाजिक समरसता गोष्ठी एवं समरसता सहभोज' ने न केवल समाज को एकता का संदेश दिया, बल्कि सदियों से व्याप्त जातीय भेदभाव और ऊँच-नीच की बेड़ियों को तोड़ने की दिशा में एक सशक्त कदम भी बढ़ाया।
इस गरिमामय आयोजन का मुख्य उद्देश्य सनातन धर्म की उस मूल भावना को पुनर्जीवित करना था, जिसे हमारे ऋषि-मुनियों ने "वसुधैव कुटुंबकम्" (संपूर्ण विश्व एक परिवार है) के रूप में परिभाषित किया है। हजारों की संख्या में उमड़े सनातनी भाई-बहनों और संत समाज की उपस्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया कि हिंदू समाज अब जातिगत राजनीति और विभाजनकारी शक्तियों के विरुद्ध एकजुट होने के लिए तैयार है।
जातिवाद के विष को समाप्त करने का संकल्पआज के दौर में जब राजनीतिक स्वार्थों के चलते समाज को जातियों में बांटने की कोशिशें तेज हो रही हैं, ऐसे समय में राष्ट्रीय हिन्दू रक्षा परिषद का यह प्रयास एक मशाल की तरह उभरा है। कार्यक्रम की शुरुआत में वक्ताओं ने रेखांकित किया कि जातीय भेदभाव न केवल हमारे समाज को कमजोर कर रहा है, बल्कि यह हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा और अखंडता के लिए भी एक बड़ा खतरा है।
परिषद के पदाधिकारियों ने स्पष्ट किया कि सनातन धर्म कभी भी समाज को बाँटने वाला नहीं रहा। यह एक ऐसी जीवन-दृष्टि है जो करुणा, समानता और आपसी प्रेम पर टिकी है। गोष्ठी के दौरान चर्चा का मुख्य केंद्र रहा कि कैसे 'छुआछूत' और 'वैमनस्य' जैसे कुरीतियों को जड़ से मिटाकर एक ऐसे समाज का निर्माण किया जाए जहाँ हर व्यक्ति को समान सम्मान मिले।नाम के पीछे जाति नहीं, 'सनातनी' लिखने का आह्वानकार्यक्रम के मुख्य आकर्षण और मार्गदर्शक राष्ट्रीय हिन्दू रक्षा परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. राकेश कुमार सनातनी रहे। उन्होंने अपने ओजस्वी संबोधन में एक क्रांतिकारी आह्वान किया। उन्होंने कहा कि हमें अपनी पहचान को जातियों के संकीर्ण दायरे से बाहर निकालना होगा। जातिगत व्यवस्था केवल राजनीतिक लाभ के लिए जीवित रखी जा रही है। हमारे वेदों, पुराणों, रामायण और महाभारत जैसे महान ग्रंथों में कहीं भी ऊँच-नीच का स्थान नहीं है। भगवान राम ने शबरी के जूठे बेर खाकर और निषादराज को गले लगाकर समरसता का जो पाठ पढ़ाया था, हमें उसे पुनर्जीवित करना होगा।
डॉ. राकेश कुमार ने उपस्थित जनसमूह से आग्रह किया कि वे अपने नाम के पीछे लगे जाति-सूचक शब्दों को हटाकर 'सनातनी' शब्द का प्रयोग करना शुरू करें। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सनातन समाज आज एकजुट नहीं हुआ, तो आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित नहीं रहेगा। जातीय आग लगाकर राजनीति करने वाले तत्व समाज को भीतर से खोखला कर रहे हैं।संतों का उद्बोधन: धर्म ही एकता का आधारकार्यक्रम में देश के विभिन्न हिस्सों से आए पूज्य संतों और महात्माओं ने अपनी उपस्थिति से वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। अंतरराष्ट्रीय महामंडलेश्वर बाबा महादेव (हनुमानगढ़ी, नैमिषारण्य) ने कहा कि सनातन संस्कृति विश्व की सबसे उदार संस्कृति है। यहाँ आत्मा और परमात्मा के मिलन की बात होती है, फिर इंसानों के बीच भेद कैसा।
पयागपुर स्टेट के यशवेंद्र विक्रम सिंह और आचार्य संजय वैदिक ने ऐतिहासिक तथ्यों के माध्यम से बताया कि कैसे विदेशी आक्रांताओं और बाद में षड्यंत्रकारी राजनीति ने हिंदू समाज को जातियों में विभाजित कर अपनी सत्ता स्थापित की। संतों ने एक स्वर में कहा कि 'समरसता' केवल एक शब्द नहीं, बल्कि हमारे जीवन का आधार होनी चाहिए।समरसता सहभोज: जहाँ मिट गई हर दूरीगोष्ठी के पश्चात समरसता सहभोज का आयोजन किया गया, जो इस कार्यक्रम का सबसे भावुक और प्रभावी हिस्सा था। गोमती के तट पर बने विशाल पंडाल में समाज के हर वर्ग, हर जाति और हर आर्थिक पृष्ठभूमि के लोगों ने एक साथ पंक्तिबद्ध होकर भोजन किया।
सहभोज ने यह संदेश दिया कि सामाजिक समरसता केवल मंच से दिए जाने वाले भाषणों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे व्यवहार में उतारना अनिवार्य है। जब एक ब्राह्मण, एक दलित, एक पिछड़ा और एक सामान्य वर्ग का व्यक्ति एक ही थाली से प्रेरणा लेकर साथ भोजन करता है, तो समाज को विभाजित करने वाली दीवारें अपने आप ढह जाती हैं।देशभर में पहुंचेगी मुहिम : मुकेश सनातनीसंगठन के राष्ट्रीय महासचिव मुकेश सनातनी ने आगामी योजनाओं का खाका पेश किया। उन्होंने घोषणा की कि यह मुहिम केवल लखनऊ तक सीमित नहीं रहेगी। राष्ट्रीय हिन्दू रक्षा परिषद इस अभियान को देश के हर प्रदेश, नगर, वार्ड और ग्राम सभा स्तर तक ले जाएगी।
मुकेश जी ने कहा कि हमारे कार्यकर्ता घर-घर जाएंगे और लोगों को समझाएंगे कि हम सब एक ही ईश्वर की संतान हैं। 'जाति छोड़ो, सनातनी बनो' के मंत्र को जन-जन तक पहुंचाया जाएगा।
कार्यक्रम में उपस्थित प्रमुख गणमान्य व्यक्ति
इस आयोजन की सफलता के पीछे संगठन के असंख्य कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों की कड़ी मेहनत रही। कार्यक्रम में निम्नलिखित प्रमुख विभूतियाँ उपस्थित रहीं।
संत समाज : अंतरराष्ट्रीय महामंडलेश्वर बाबा महादेव, कौशलेंद्र नाथ, संजय दास बाबा जी, बजरंग दास जी, महंत हररामदास।
विचारक एवं अतिथि : यशवेंद्र विक्रम सिंह, आचार्य संजय वैदिक जी, गुलाब चीन।
संगठन पदाधिकारी :
डॉ. राकेश कुमार सनातनी (राष्ट्रीय अध्यक्ष), मुकेश सनातनी (राष्ट्रीय महासचिव),
साधना सनातनी (राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष), विवेक सनातनी (राष्ट्रीय युवा शक्ति रक्षा सह संयोजक), ज्योति कुमार सनातनी (प्रदेश उपाध्यक्ष), कुलदीप सनातनी (प्रदेश संयोजक), प्रवेश सनातनी (प्रदेश उपाध्यक्ष), भवानी प्रसाद सनातनी (प्रदेश विशेष संपर्क प्रमुख), हिमांशु सनातनी (जिला उपाध्यक्ष), अनिल सनातनी (जिला सह संयोजक), पूजा सनातनी (निजी सचिव), विजय सनातनी (अयोध्या मंडल अध्यक्ष), संदीप सनातनी (अयोध्या मंडल उपाध्यक्ष),
इसके अलावा वार्ड अध्यक्षों में राज कुमार सनातनी, सुनील सनातनी, संजय कुमार सनातनी, नरेश कुमार सनातनी, गुरु दयाल सनातनी, अजीत प्रताप सनातनी और राजवीर सनातनी ने भी अपनी सक्रिय सहभागिता निभाई। महिला शक्ति का नेतृत्व सरिता सनातनी (जिला महाशक्ति संयोजिका) ने किया।
राष्ट्र निर्माण की ओर एक कदम
लखनऊ का यह आयोजन महज एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक आंदोलन की शुरुआत है। राष्ट्रीय हिन्दू रक्षा परिषद ने यह सिद्ध कर दिया है कि जब लक्ष्य पवित्र हो और नीयत साफ हो, तो समाज को एकजुट करना असंभव नहीं है। वर्तमान समय में जब विभाजनकारी शक्तियां सक्रिय हैं, तब सनातन धर्म की समरस परंपरा को पुनर्जीवित करना ही राष्ट्र निर्माण का सबसे बड़ा कार्य है।
लखनऊ की गोष्ठी ने स्पष्ट कर दिया है कि अब सनातनी समाज ऊंच-नीच और छुआछूत जैसी कुरूतियों को त्यागकर एक सशक्त, अखंड और समरस भारत के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध है।
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