Madhya Pradesh : यहां हनुमान जी की मूर्ति का 24 घंटे में तीन बार बदलता है रूप

हनुमान जी की मूर्ति का बाल रूप।


हनुमान जी की मूर्ति का युवा रूप।


हनुमान जी की मूर्ति का वृद्धावस्था का रूप।


 

प्रारब्ध अध्यात्म डेस्क, लखनऊ 




आज हम आपको हनुमान जी के एक ऐसे मंदिर के बारे में बताएंगे। जिसके बारे में कहावत है कि इस मंदिर में लगी मूर्ति का रूप 24 घंटे में तीन बार बदलता है। कहा जाता है कि हनुमान जी की प्रतिमा का सुबह के समय बाल स्वरूप, दोपहर में युवा और फिर शाम ढलने के बाद से पूरी रात वृद्ध रूप हो जाता है। आइए जानते हैं कि हनुमान जी के इस मंदिर के बारे में, क्यों बदलता है उनका स्वरूप और क्या है इस मंदिर की विशेषता। देश के किस राज्य में स्थित है हनुमान जी का प्राचीनतम मंदिर।


मंदिर का प्रवेश द्वार।



मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के मंडला (Mandla) जिला मुख्यालय से तीन किलोमीटर दूर पुरवागांव (Purva Gaon) में श्रद्धा और भक्ति का यह प्राचीन केन्द्र स्थित है, जिसे सूरजकुंड (Suraj Kund) भी कहा जाता है। यहां पर हनुमान जी का एक प्राचीन मंदिर है। मंदिर में प्रतिष्ठित हनुमान जी के त्वचा का रंग अत्यंत ही दुर्लभ पत्थर से निर्मित है। उनकी आदमकद प्रतिमा रामायणकाल की घटनाओं का विवरण देती है। हनुमानजी का चेहरा आकर्षण और तेज लिए हुए है, जिससे दिव्यता व असीम शांति का अनुभव होता है। मंदिर में विराजमान हनुमान जी की इस दुर्लभ मूर्ति की खासियत यह है कि ये चौबीस घंटो में प्राकृतिक तरीके से तीन बार अपना रूप बदलती है।




मंदिर के पुजारी की मानें तो भोर चार बजे से 10 बजे तक हनुमान जी की प्रतिमा का बाल स्वरूप रहता है। उसके बाद सुबह 10 बजे से शाम 6 बजे तक युवा और शाम 6 बजे से रात भर वृद्ध स्वरूप हो जाता है। तीन स्वरूप वाले इस चमत्कारी हनुमान जी के मंदिर में दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। 




स्थानीय लोग और भक्तों की मानें तो सूरजकुंड के मंदिर में विराजमान हनुमान जी की यह प्रतिमा दुर्लभ है। ऐसी प्रतिमा देश में और कहीं देखने को नहीं मिलती है। मंदिर में पहुंचने वाले सभी भक्तों को इस मंदिर के प्रति बड़ी आस्था है। कहा जाता है जो भी इस मंदिर में आता है और अर्जी लगाता है, उसकी मनोकामना जरूर पूरी होती है।


इतिहासकारों के मुताबिक यह मंदिर नर्मदा के किनारे बना हुआ है, जहां सूर्य की सीधी किरणें नर्मदा पर पड़ती हैं, तो एक आलौकिक सौंदर्य उत्पन्न होता है। मान्यता हैं कि यहां पर भगवान सूर्य तपस्या करते थे। भगवान सूर्य की तपस्या में विघ्न न पड़े इसलिए हनुमान जी यहां पर पहरा दिया करते थे। जैसे ही भगवान सूर्य की तपस्या पूरी हुई तो भगवान सूर्य अपने लोक की ओर जाने लगे, जिसके बाद हनुमान जी को भगवान सूर्य ने यहीं रुकने के लिए कहा तो हनुमान जी यहीं मूर्ती के रूप में रुक गए। कहा जाता है कि भगवान सूर्य की किरणों के साथ ही भगवान हनुमान जी अपने बाल रूप में नजर आते हैं। इसके बाद अलग-अलग पहर में अपने रूप बदलते हैं। सूर्यकुंड कलयुग में हनुमान हैं इसका सही प्रमाण भी मिलता है.

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