Prarabdh Research : पैदा होते न रोने वाले नवजात की आंखों की चली जाती रोशनी, अब संभव है इलाज

  • जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभागाध्यक्ष चार नवजात का कर रहे इलाज
  • दो साल में एक बच्चे की दूर हुई अंधता, तीन में भी मिलने लगे हैं सकारात्मक परिणाम


अरुण कुमार 'टीटू', कानपुर


नवजात का जन्म के समय नहीं रोना घातक साबित होता है। ऐसे बच्चों का ब्रेन डैमेज होने का खतरा रहा है, जिससे अंधता के साथ सुनने एवं बोलने की क्षमता विकसित नहीं होती है। ऐसे नवजात के ब्रेन में ऑक्सीजन की कमी होने से आंखों की ऑप्टिक नर्व डैमेज होने से रोशनी चली जाती है। इन नवजात की अंधता दूर करने का इलाज जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभागाध्यक्ष ने ढ़ूंढ निकाला है। दो साल की मशक्कत के बाद एक बच्चे की अंधरा दूर करने में कामयाब हुए, जबकि तीन अन्य में भी अच्छे परिणाम मिले हैं। इस रिसर्च को अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित करने को भेजा है।


पैदा होते ही नहीं नवजता का नहीं रोना उसके लिए घातक साबित होता है। विलंब से रोने वाले बच्चों के मस्तिष्क में रक्त का संचार नहीं होता है, जिससे नवजात के शरीर का रक्त संचार बाधित हो जाता है। ब्रेन में रक्त का संचार नहीं होने से ऐसे बच्चे दम तोड़ देते हैं। जो नवजात बच जाते हैं मस्तिष्क के तंत्रिका तंत्र (नर्वस सिस्टम) को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलने से ब्रेन इंजरी हो जाती है। ब्रेन डैमेज होने से आंखों की रोशनी पूरी तरह चली जाती है। इन बच्चों में शुरूआती अवस्था में समस्या का पता नहीं चल पाता है। जब वह तीन-चार माह के होते हैं और खिलाने के दौरान इधर-उधर नजर नहीं दौड़ाते हैं तो समस्या का पता चल पाता है।


अब तक चार नवजात आए


जन्म के साथ अंधता की समस्या वाले चार बच्चे मेडिकल कॉलेज के हैलट अस्पताल के नेत्र रोग विभाग में इलाज के लिए वर्ष 2017-18 के बीच आए। उसमें से तीन नवजात शहर के हैं, जबकि एक फतेहपुर जिले का है। उसमें दो नवजात बाल रोग अस्पताल से सीधे आए, जबकि दो नवजात शहर के बड़े निजी अस्पताल से यहां रेफर होकर आए हैं। नेत्र रोग विभागाध्यक्ष प्रो. परवेज खान ने ऐसे बच्चों का परीक्षण किया तो पाया कि आंख से ब्रेन को जाने वाले ऑप्टिक नर्व में खून का संचार ठीक से न होने से अंधता आई है। इसके लिए कुछ जरूरी जांच कराई।


ऑप्टिक नर्व का वीईपी टेस्ट


आंख की ऑप्टिक नर्व की क्षमता एवं गतिविधि जानने के लिए विजुअल इवोक पोटेंशियल (वीईपी) टेस्ट कराया। इन बच्चों की जांच रिपोर्ट में नर्व की एक्टिविटी शून्य पाई गई। ऐसे में नर्व में खून का सर्कुलेशन बढ़ाने के लिए विशेष प्रकार की दवा चलाने का निर्णय लिया गया। छह-छह माह के अंतराल में जांच कराई, जिससे सकारात्मक परिणाम मिलने लगे। एक बच्चे में दो साल में पूरी रोशनी आ गई, जबकि तीन में भी बेहतर रिजल्ट मिले हैं।


एम्स दिल्ली में इलाज व जांच


ऐसे बच्चों के इलाज और जांच की सुविधा सरकारी क्षेत्र में न जीएसवीएम और न ही लखनऊ के किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी में है। जन्म के समय ऑक्सीजन की कमी से अंधता वाले नवजात को इलाज के लिए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स दिल्ली) भेज दिया जाता है। जहां के राजेंद्र प्रसाद नेत्र संस्थान में जांच एवं इलाज की सुविधा है।


ऑक्सीजन की कमी से हुई जन्मजात अंधता का कोई इलाज नहीं था। यह समस्या मस्तिष्क में रक्त संचार प्रभावित होने से होती है। इसके लिए खून का संचार बढ़ाने वाली एक पुरानी दवा का इस्तेमाल किया गया। बच्चे छोटे थे, इसलिए दवा का पाउडर बनाकर उसे शहद व दूध के साथ नियमित दिया गया। उसके बेहतर परिमणा सामने हैं। उनमें से एक बच्चे के माता-पिता ने रोशनी लौटने की जानकारी दी। उसकी वीईपी की रिपोर्ट भी 100 फीसद आई है, जबकि तीन अन्य बच्चों की रिपोर्ट 50 फीसद। उनका इलाज चल रहा।

  • प्रो. परवेज खान, नेत्ररोग विभागाध्यक्ष, जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज।

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